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साइबर फ्रॉड के अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश

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पकड़े गए अपराधी। - फोटो : amar ujala
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  बस्ती। सरस्वती वरिष्ठ विद्या मंदिर रामबाग के खाते से 50 लाख 80 हजार रुपये निकाल लेने के मामले का पुलिस ने मंगलवार को पर्दाफाश कर दिया। गिरोह के तीन गुर्गे दबोच लिए गए हैं। इनके कब्जे से तमाम फर्जी सिमकार्ड, आईडी, मोबाइल, एटीएम कार्ड, कार आदि बरामद किए गए। यूपी के अलावा दिल्ली, राजस्थान, महाराष्ट्र सहित अन्य प्रदेशों में भी इनके साथी सक्रिय हैं।
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डीआईजी/एसपी दिलीप कुमार ने प्रेसवार्ता के दौरान बताया कि तीनों आरोपी अंतरराज्यीय गिरोह के सदस्य हैं। ये बैंक से डाटा एकत्र कर खाता से लिंक मोबाइल को फर्जी आईडी से रिप्लेस कराकर सिम जारी कराते थे। फर्जी आईडी से बैंक में खाता खोलकर साइबर अपराध के जरिये अपने खातों मेें रकम ट्रांसफर करते थे। नेटबैंकिग के माध्यम से धनराशि निकलवा लेते थे। इनमें मोहम्म्द गुलजार निवासी रायपुर थाना कैंट जिला अयोध्या, रंजीत कुमार गुप्ता निवासी आवास विकास कालोनी, कटरा, थाना कोतवाली बस्ती और दशरथ रामबिंद उर्फ दिनेश निवासी पहाड़ीपुर थाना मुहम्मदाबाद जनपद गाजीपुर शामिल हैं। इन लोगों ने मुंबई स्थित बैंक के खातों में रकम ट्रांसफर की थी। नेट बैंकिंग के लिए बैंक में फीड सिम का ही उपयोग किया गया था। इसके लिए सिम को निरस्त कर दूसरा सिम 10 दिसंबर को ही जारी करा लिया था। महाराष्ट्र, लखनऊ व राजस्थान के बैंक खाते में पूरी रकम ट्रांसफर की गई। मुंबई में बदायूं के रहने वाले माजिद नबी के औरैया पुलिस के हत्थे चढ़ने के बाद फ्रॉड की जानकारी हुई। एक खाते में बचे पांच लाख 77 हजार रुपये जब्त कराए गए है। 
 
क्या है मामला      
- 15 दिसंबर को सरस्वती विद्या मंदिर रामबाग विद्यालय के खाते से 50 लाख 80 हजार रुपये निकाल लिए गए। विद्यालय के प्रबंधक अभय पाल ने तहरीर दी कि बैंक ऑफ इंडिया बस्ती शाखा में उनका खाता है। पासबुक पर 15 दिसंबर को प्रिंट कराने पर पता चला कि आठ बार में 50 लाख 80 हजार रुपये निकाल लिए गए। बैंक अधिकारी से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि ये रुपये नेट बैंकिंग से दूसरे खाते में भेजे गए हैं।
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स्वाट व कोतवाली को कामयाबी      
- कोतवाल महेन्द्र प्रताप चतुर्वेदी, स्वाट प्रभारी विक्रम सिंह के अलावा, छोटेलाल, सुरेन्द्र यादव, आदित्य पाण्डेय, अजय दूबे, सदानन्द यादव, अरुणेश यादव, अमित पाठक, मनोज पाण्डेय, हरेन्द्र यादव, राहुल सिंह आदि ने यह कामयाबी हासिल की।     
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हाईटेक पुलिसिंग का सॉफ्टवेयर फेल

बस्ती। अपराध रोकने और अपराधियों पर शिकंजा कसने के लिए ईजाद किए गए क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क सिस्टम (सीसीटीएनएस) फेल हो रहा है। सिस्टम की खामियां नजरअंदाज करने से विसंगतियां सामने आने लगीं हैं। 
सीसीटीएनएस में आई इस गड़बड़ी से तमाम उपलब्धियां ऑनलाइन अपलोड होने से रह जा रहीं हैं। इसका प्रभाव समीक्षा और रिसर्च में पड़ रहा है। जानकार बताते हैं कि थाने का क्राइम नंबर अलॉट न होने से बाद में उन केस का स्टेटस ऑनलाइन ढूंढना मुश्किल होगा। सबसे ज्यादा सीआरपीसी की कार्रवाई अपडेट न हो पाने की समस्या है। इससे स्टेट क्राइम रिसर्च ब्यूरो और नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो को गुंडा, गैंगेस्टर, जिला बदर जैसी निरुद्धात्मक कार्रवाई की जानकारी ही नहीं हो पा रही है। बताया जा रहा है कि सॉफ्टवेयर में ही खामी है। 
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अपराध को रोकने और अपराधियों पर नकेल कसने के लिए क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क सिस्टम (सीसीटीएनएस) योजना शुरू की थी। इसके तहत सूबे के सभी थानों को कम्प्यूटराइज कर कंट्रोल रूम से जोड़ा गया ताकि पुलिस अपराधियों के नेटवर्क को खंगाल कर उन्हें पकड़ सके। थानों में मुंशी की तरह दरोगा और विवेचक भी अब जनरल डायरी और केस डायरी हाथ से तैयार करने के बजाए कम्प्यूटर में डायरी बना रहे हैं। इसके लिए उन्हें ट्रेनिंग दी जा रही है। इधर, कुछ दिनों से गुंडा एक्ट, जाब्ता फौजदारी, शांतिभंग की आशंका जैसी कार्रवाई को ऑनलाइन डाटा नहीं स्वीकार कर रहा है। डीआईजी/एसपी दिलीप कुमार का कहना है कि तकनीकी विसंगति सामने आई है, जिसके लिए उच्चस्तरीय टीमें निदान ढूंढने में लगी हैं।  
रिसर्च ब्यूरो के आंकड़ों में गड़बड़ 
सेवानिवृत्त आईपीएस अफसर लक्ष्मी नारायण के अनुसार सॉफ्टवेयर में खामी का दूरगामी असर देखने को मिलेगा। कारण यह कि अनुसंधान ब्यूरो को आंकडे़ ही नहीं अपडेट हो रहे हैं। असल में जिले स्तर पर स्थापित डीसीआरबी (जिला अपराध अनुसंधान ब्यूरो), राज्य स्तर पर एससीआरबी (राज्य अपराध अनुसंधान ब्यूरो) और एनसीआरबी (राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान ब्यूरो) का कामकाज और आंकड़े अपलोड किए जाने लगे। इससे सजायाफ्ता अपराधियों, बार-बार एक ही तरह का अपराध करने वालों की साइकोलॉजी समझने में पारदर्शिता और पैनापन आया।    
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