बस्ती। अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम उमेश यादव ने धोखाधड़ी व कूट रचना के मामले में आरोपी को 7 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। आरोपी को न्यायालय ने 5500 रुपये अर्थदंड भी लगाया है। इसे अदा न करने पर 2 माह 15 दिन की अतिरिक्त सजा भुगतनी होगी।
रुधौली थाना क्षेत्र के ग्राम डड़वा तौफ़ीर निवासी श्रीराम ने अपने चचेरे भाई परशुराम के विरुद्ध धोखाधड़ी व कूटरचना का आरोप लगाते हुए न्यायालय में मुकदमा दर्ज कराया। कहा कि वह दो भाई हैं। उनके छोटे भाई का नाम कंचन प्रसाद है। उनका चचेरा भाई परशुराम लालची प्रवृत्ति का है। वह मुंबई में काम-धंधा करता है। अपने रुपये बदौलत दूसरों की जमीन जालसाजी कर हड़पने का काम करता है। श्रीराम के पिता रामेश्वर को यह डर था कि कहीं जालसाजी करके उनके हिस्से की जमीन को भी परशुराम हथिया न ले। यही सोचते हुए उन्होंने अपने दोनों पुत्रों श्रीराम और कंचन प्रसाद के हक में 18 दिसंबर 1996 को अपनी संपत्ति का पंजीकृत बैनामा कर दिया। जब इसकी भनक परशुराम को लगी तो उसने बैनामा की नकल ली और कूट रचना करते हुए श्रीराम व कंचन प्रसाद के नाम के बीच अपना नाम परशुराम लिखवा लिया। इसी आधार पर खारिज दाखिल की दरखास्त देखकर 15 अप्रैल 1997 को अपना नाम भी राजकीय अभिलेखों में दर्ज करा लिया।
इसकी जानकारी होने पर श्रीराम ने तहसील में शिकायती प्रार्थना पत्र दिया और 15 जुलाई 2000 को परशुराम का नाम निरस्त कर दिया गया। केवल दोनों क्रेता श्रीराम और कंचन प्रसाद का नाम ही दर्ज रखा गया।
दूसरी तरफ परशुराम ने 18 दिसंबर 1996 को बैनामा निरस्त करने के लिए दीवानी न्यायालय में मुकदमा दाखिल किया। दोनों पक्षों की सुनने के बाद 14 अगस्त 2007 को न्यायालय ने परशुराम के मुकदमे को खारिज कर दिया। अदालत में इस मुकदमे की नकल भी श्रीराम ने दाखिल की। पत्रावली में उपलब्ध साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद न्यायालय ने माना कि परशुराम अपने बनाए हुए जाल में स्वयं फंसा हुआ है। एक तरफ उसने 18 दिसंबर 1996 के बैनामे की नकल में अपना नाम बढ़ा लिया, दूसरी तरफ उसी बैनामा को निरस्त करने के लिए श्रीराम और कंचन प्रसाद के विरुद्ध मुकदमा भी दाखिल किया था। ऐसे में न्यायालय ने उसके विरुद्ध आरोप की साबित होने के बाद सजा सुनाई है।