- हर बार निरीक्षण तक ही सिमट जाती है कार्रवाई, नहीं हो पा रही जलाशयों की पैमाइश
- पांडेय पोखरा, महदेव ताल समेत सभी जलाशयों पर हो चुका है कब्जा, घट गया आयत
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। शहर के चर्चित सरोवरों को प्रशासन सहेज नहीं पा रहा है। इन पर भू- माफियाओं का लगातार कब्जा बढ़ता जा रहा है। कार्रवाई के नाम पर हर बार केवल निरीक्षण ही हो पाता है। इसके बाद मामला शांत हो जाता है। तब तक सरोवरों के किनारे नए कब्जे कर लिए जाते हैं। इसी खेल में अधिकांश जलाशयों का आयत घटकर कहीं आधा हो गया है तो कहीं वह भी विलुप्त होने के कगार पर है। पांडेय पोखरा और महदेव ताल समेत आधा दर्जन सरोवर अवैध कब्जे की जद में है। इनके भूमि की न तो पैमाइश हो पा रही है और न ही अवैध कब्जे हटाए जा रहे हैं।
शहर के महत्वपूर्ण जलाशयों को भी भूमाफियाओं ने नहीं बख्शा है। इसमें राजस्व विभाग के जिम्मेदारों की भी मिलीभगत से इनकार नहीं किया जा सकता है। मुरलीजोत वार्ड के चइयाबारी में एक ताजा मामला सामने आया है। यहां तालाब की जमीन हथियाने के लिए पहले राजस्व अभिलेख में हेरफेर की गई। इसमें फर्जी ढंग से तालाब के नाम दर्ज भूमि पर दूसरे का नाम इंद्राज करा लिया गया। बाद में इस पर कब्जा कर मैरेज हॉल का निर्माण हो गया। लगभग एक दशक से तालाब की इस भूमि को मैरेज हॉल के रूप में व्यवसायिक उपयोग में लाया गया। 27 जनवरी को एसडीएम सदर ने जब यहां छापा मारकर भूलेख की पड़ताल शुरू की तो अवैध कब्जे की हकीकत सामने आई। हालांकि प्रशासन अभी इस भूमि को कब्जा मुक्त नहीं करा सका है और न ही कब्जेदार पर कोई ठोस कार्रवाई की गई है। सिर्फ मैरेज हॉल की बुकिंग पर रोक लगाई गई है। यह तो बानगी मात्र है विभिन्न वार्डों में स्थित शहर के आधा दर्जन जलाशयों पर इसी तरह अवैध कब्जा बना हुआ है। जिनकी शिकायतें भी लगातार हो रही है। मगर इस पर अमल नहीं हो पा रहा है।
पहले राजस्व अभिलेख में होता है फेरबदल, फिर कब्जा
तालाब, पोखरों की जमीन हथियाने के लिए भू- माफिया पहले तहसील में सॉठगाॅठ कर राजस्व अभिलेख में खेल करते हैं। अच्छा खासा चढ़ावा चढ़ाकर जलाशयों की भूमि पर अपना या चहेतों का नाम दर्ज करा दिया जाता है। फिर इसी आधार पर जलाशयों को मिट्टी एवं कूड़े से पाटकर समतल भूमि तैयार की जाती है। लाख- दो लाख के खर्च पर एक से दो विस्वा जमीन तैयार हो जाती है। जिसे बाद में बेचकर अच्छी खासी रकम हासिल की जाती है। इसी तरह सिलसिलेवार जलाशयों को चौतरफा कब्जा कर लिया जाता है।
सिकुड़ता गया पांडेय पोखरा, बस गई कंकरीट की कालोनी
शहर के तुरकहिया, महरीखांवा, लौकियहवा के सिवान में स्थित पांडेय पोखरा को रमणीय स्थल के रूप में संवारा जा सकता था। मगर यहां भू-माफियाओं ने अपना संजाल बिछा दिया है। इस जलाशय के किनारों की जमीन हड़प ली गई है। डेढ़ दशक से यहां कब्जा करने का खेल चल रहा है। खतौनी से लेकर मौके पर भारी फेरबदल हुआ। यह जलाशय दिन-ब-दिन सिकुड़ता गया और इसके चारों तरफ कंकरीट की कालोनी बस गई। अभी दो माह पहले प्रशासन इस जलाशय को संरक्षित करने के उद्देश्य से सक्रिय हुआ। राजस्व टीम मौके पर पहुुंचकर निरीक्षण भी की। दावा किया गया जल्द ही इस जलाशय की पैमाइश कर रकबा चिह्नित किया जाएगा। कब्जेदारों ने भागदौड़ शुरू कर दी। इसी के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया। अब पांडेय पोखरा फिर से बेहाल स्थिति में हो गया।
महदेव ताल भी कर लिए कब्जा, मेहमान पक्षियों ने उजाड़ा बसेरा
अभी दो दशक पहले तक शहर के रेलवे स्टेशन मार्ग और नारंग रोड के बीच लगभग एक किमी के दायरे में दीर्घ आकार का महदेव ताल हुआ करता था। यह साइबेरियन पक्षियों का रैनबसेरा कहा जाता था। मगर भू- माफियाओं की नजर पड़ी तो यह ताल भी घटता चला गया। अवैध कब्जे के चलते मेहमान पक्षियों ने अपना बसेरा तक उजाड़ लिया। यहां अभिलेखों से छेड़छाड़ कर लोगों ने तालाब की भूमि अपने नाम करा ली है। अधिकांश भू-भाग पर कब्जा भी हो गया है। सड़क के किनारे की भूमि पर कामर्शियल और पीछे की जमीनों में आवासीय निर्माण हो गया है। सौ बीघे से अधिक महदेव ताल की जमीन की पैमाइश तक नहीं हो पा रही है। कब्जे के समय रात- रात भर जेसीबी से तालाब को पाटने का काम किया जाता है।
खत्म हो गया भुजैनी का पौराणिक पोखरा
शहर का एक मात्र पौराणिक भुजैनी का पोखरा भी भू-माफियाओं ने खत्म कर दिया। वर्तमान में इस पोखरे का अस्तित्व ही नहीं रह गया है। कटेश्वर पार्क से बिल्कुल सटे इस पोखरे के किनारे नाग पंचमी के दिन भाई- बहन एकत्र होते रहे। यहां गुड़िया पीटने का रस्म निभाया जाता था। पोखरे के आसपास मेला लगता रहा। वर्तमान में इस पोखरे को चारों तरफ से कब्जा कर लिया गया है। इसमें संबंधित नौ फसली वर्ष की खतौनी अभिलेखागार से गायब है। इसी अवधि में तालाब की जमीन पर कई लोगों का नाम इंद्राज हो गया है। छह माह पहले खतौनी गायब होने का खुलासा होने पर तत्कालीन डीएम ने जॉच शुरू कराई थी। मगर उनके स्थानांतरण के बाद यह मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
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केस- एक
शहर के लैबुड़वा ताल की जमीन पर भू- माफियाओं ने कब्जा करना शुरू कर दिया था। तमाम भू-भाग पाटकर बेच लिए गए। यहां कुछ मकान भी बन गए। लगातार शिकायत होने पर प्रशासन हरकत में आया। वर्ष 2018 में यहां की जमीनों के रजिस्ट्री और मानचित्र स्वीकृति करने पर रोक लगा दी गई। इसके बाद से कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी है। जबकि इस स्थल को कब्जा मुक्त कर पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जा सकता है।
केस- दो
जिला अस्पताल से ओपेक कैली मार्ग के किनारे जखनी गांव में स्थित जलाशय की जमीन को पाटकर कब्जा कर लिया गया है। डेढ़ साल पहले तहसील स्तर से कब्जेदारों को नोटिस भी दी गई। एक- दो बार राजस्व टीम मौके पर पहुंचकर कब्जा रोकने का प्रयास भी किया। मगर इस जलाशय के 8 विस्वा भू-भाग की पैमाइश कर खाली नहीं कराई जा सकी है। अब फिर से मामला ठंडे बस्ते में चला गया है।
केस- तीन
शहर के कुआनो नदी के निकट सरकारी प्रकृति की जमीन को अभिलेख से छेड़छाड़ कर कुछ लोगों ने अपने नाम करा ली थी। वर्ष 2018 में तत्कालीन डीएम डॉ. राजशेखर से इस मामले की शिकायत हुई। उन्होंने जॉच कराया तो पता चला कि फर्जी ढंग से सरकारी प्रकृति की जमीन को लोगों ने अपने नाम करा लिया है। इसके अभिलेख दुरुस्त कराकर अवैध कब्जेदारों को बेदखल किया गया।
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तालाब, पोखरे की जमीन पर निर्माण नहीं किया जा सकता है। इसका मालिकाना हक भले ही किसी के पास हो पर जलाशय के भूमि की प्रकृति बदलने का अधिकार नहीं है। दूसरा यह कि जलाशयों को संरक्षित करने के लिए सबसे पहले पक्की पैमाइश करानी होगी। तभी अवैध कब्जा के साथ वास्तविक रकबा स्पष्ट हो सकेगा। यदि राजस्व अभिलेख में फेरबदल पाया जा रहा है तो इसमें केवल भूमाफिया अकेले दोषी नहीं है सरकारी मुलाजिम की भी भूमिका संदिग्ध मानी जाएगी।
धर्मेंद्र नारायण त्रिपाठी, अधिवक्ता।
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जलाशयों की जमीन की पैमाइश जल्द कराई जाएगी। एक- एक कर सभी जलाशयों से अवैध कब्जेदार हटाए जाएंगे। अभियान शीघ्र शुरू होने वाला है।
गुलाब चंद्र, एसडीएम।