बस्ती। चिटफंड कंपनियों के जाल में फंसे तो जिंदगी तबाह हो जाएगी। इन कंपनियों का पैंतरा अब बदल चुका है। आपकी गाढ़ी कमाई को ऐंठने का इनके पास नया तरीका है। बेरोजगारी के दिनों में इनका ऋण बांटने वाला दिवास्वप्न आपको खूब लुभाएगा।
दुकान एवं कामर्शियल गाड़ी के लिए यह 50 हजार से 5 लाख तक का ऋण मामूली प्रक्रिया में उपलब्ध करा रहे हैं। फिर ब्याज भरते-भरते आपकी उम्र गुजर जाएगी, मगर देनदारी कभी खत्म नहीं हो सकती। यदि इनकी शर्तों पर पैसा अदा नहीं करते चले तो कंपनियों की ओर से आपराधिक छवि के शोहदे आपका घर से निकलना मुहाल कर देंगे।
जनपद के मेहनतकश का सौ करोड़ से अधिक रुपये का भुगतान विभिन्न फाइनेंस कंपनियां दबाए हुए हैं। इसमें एक को छोड़कर सभी के ऑफिस बंद हो चुके हैं। अब नया खेल यह हो रहा है कि माइक्रो फाइनेंस के नाम पर ये कंपनियां शहर से लगते गांवों तक अपना जाल फैला चुकी हैं। अगर एक बार कर्ज ले लिया तो पूरी जिंदगी भरना पड़ेगा। इनके ब्याज का गणित कम पढ़े लिखे लोगों की समझ में नहीं आता है। जब बात वसूली की आती है तो इनकी हरकत माफियाओं के गिरोह की तरह हो जाती हैं।
दो से तीन दशक के बीच में जिले में कई फाइनेंस कंपनियां खुलीं और एक के बाद एक बंद होती भी गई। इसके चक्कर में आकर जिले के करीब सौ करोड़ से अधिक रुपये लोगों के डूब गए। इनके बंद होने के बाद अन्य फाइनेंस कंपनियां विभिन्न नामों से सक्रिय हो चुकी हैं। यह फाइनेंस कंपनियां दूर दूराज के गांवों को अपना निशाना बना रही हैं। इनके निशाने पर सबसे अधिक महिला और गरीब होते हैं। कर्ज देते समय यह ध्यान रखते हैं कि ऋणी ऐसा हो, जिसके साथ दबंगई भी कर सकें।
यह कंपनी केवल कागजी कार्रवाई पर रुपये दे देती है। आधार पर ऋण देने वाली कंपनी इसके बदले 18 प्रतिशत से अधिक ब्याज वसूल करती हैं। कर्ज देने के बाद वसूली की जिम्मेदारी मनबढ़ों काे सौंप दी जाती है।
महिलाओं का समूह बनाकर वसूलते हैं रुपये
सूदखोरों की तर्ज पर काम करने वाली चिटफंड कंपनी के कर्मचारी गांव में महिलाओं का एक समूह बनाते हैं, जिसमें से हर महिला से फाॅर्म भराने के बाद एक पासबुक जारी कर हर महीने रकम जमा कराते हैं। समूह में सदस्य को रुपये लेने पर तीन प्रतिशत ब्याज लगता है, और समूह से यदि महिला सदस्य गारंटर बनकर किसी अन्य को रकम दिलाती है तो महीने का छह प्रतिशत ब्याज लगता है।
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सदर और सांऊघाट ब्लॉक में तेजी से फैल रहा चिट फंड कंपनी का रोजगार
कोतवाली और पुरानी बस्ती थाना क्षेत्र के सदर और सांऊघाट ब्लाॅक क्षेत्र में चिट फंड कंपनी का रोजगार तेजी से फैल रहा है। करीब आधा दर्जन कंपनी सक्रिय रूप से शहर के निकटवर्ती गांवों में लोगों को कर्ज देकर महीने में ब्याज वसूल रही हैं। महिला समूह भी बनाया जा रहा है। दो वर्ष पूर्व शहर के किसान हाईस्कूल के पास से एक चिट फंड कंपनी लोगों की जमा पूंजी लेकर फरार हो गई, मामले में कोतवाली में शिकायत करने के बाद अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
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निरस्त हो चुके हैं साहूकारों के लाइसेंस
जिले के सौ से अधिक साहूकारों के लाइसेंस निरस्त हो चुके हैं। अफसरों की नजर में कोई सूदखोर जिले में नहींं है, लेकिन हकीकत तो यह है कि गांव- गांव कर्ज के चक्कर में लोग फंस कर गाढ़ी कमाई ब्याज में चुकता कर रहे हैं। इसके बाद भी कर्ज से पीछा नहीं छूट रहा है।
इसी साल अप्रैल में साहूकारों से मुक्ति दिलाने के लिए वर्ष 1976 का साहूकारा अधिनियम समाप्त कर दिया गया, लेकिन कर्ज बांट कर ब्याज दर ब्याज वसूल करने का खेल बंद नहीं हुआ है। अभी निजी फाइनेंस कंपनियों के एजेंट गांवों में समूह का गठन कर लोगों को कर्ज बांट रहे हैं। इसके बदले में 18 प्रतिशत से 36 प्रतिशत ब्याज वसूल किया जा रहा है। शहर में ही कई ऐसे सूदखोर हैं, जो छोटे दुकानदारों से ब्याज की रकम वसूल करते हैं।
वेतन निकासी के समय बैंक पर ही पहुंच जाते हैं सूदखोर
रेलवे मालगोदाम और प्लास्टिक कांप्लेक्स के एफसीआई गोदाम पल्लेदारों एवं अन्य छोटे कर्मचारियों पर सूदखारों की जबरदस्त पकड़ है। इन कर्मचारियों को सूदखोरों ने अपने जाल में फंसा रखा है। यहां तक कि पासबुक भी अपने पास रखते हैं। जब यह माह की एक या दो तारीख को वेतन निकालने जाते हैं तो सूदखोर झोले में पासबुक लेकर पहुंच जाते हैं। एक- एक पासबुक देते हैं और बैंक पर ही ब्याज वसूल लेते हैं।
केस- एक
शहर के रौता मुहल्ले के राम सुभग ने एक फाइनेंस कंपनी से डेढ़ लाख रुपये कर्ज लेकर टेंपो निकाला। चार महीने वह लगातार 7 हजार रुपये प्रतिमाह के हिसाब से किश्त जमा करते रहे। उनकी तबीयत बिगड़ गई, अगले दो माह की किश्त जमा नहीं कर पाए। कंपनी की ओर से आपराधिक छवि के शोहदे उनके घर पहुंच गए। गुंडई के बल पर उनका टेंपो उठा ले गए। अब वह दूसरे का टेंपो चला रहे हैं।
केस- दो
रेलवे मालगोदाम के पल्लेदार जितेंद्र ने पिता के इलाज के लिए एक सूदखोर से पचास हजार रुपये कर्ज लिया। 10 प्रतिशत ब्याज के हिसाब से पांच साल से वह हर महीने 5 हजार रुपये देते चले आए। कर्ज खत्म नहीं हुआ। बीच में कुछ महीने सूद नहीं दिया तो वह भी मूलधन में जुड़ गया। सूदखोर की डायरी में कर्ज बढ़कर दो लाख पहुंच गया। उनसे मई में सूदखोर ने 50 हजार रुपये एकमुश्त वसूल लिए। अभी बकाया खत्म नहीं हुआ है।
केस- तीन
मुरलीजोत के रहने वाले राजमन ने दुकान के नाम पर एक फाइनेंस कंपनी से एक लाख रुपये कर्ज लिया। तीन हजार रुपये प्रतिमाह उन्होंने एक साल तक चुकता किया। किन्हीं कारणों से दुकान बंद हो गई। किश्त न देने पर कंपनी के पालतू शोहदे उनसे अक्सर दबंगई करते रहे। उन्होंने रिश्तेदारों से कर्ज लेकर फाइनेंस कंपनी का एक लाख रुपये अदा किया।
वाहन ऋण के लिए पहले सरफेशी अधिनियम 2000 के तहत 13-2 और 13-4 की नोटिस दी जाती है। इसके बाद वाहन या मकान को कब्जे में लेकर बेच सकते हैं। रिकवरी करने का समय है। सुबह नौ से शाम 6 बजे तक। फोन पर धमकी नहीं दी जा सकती है। रिकवरी करने वाले के पास इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकिंग एंड फाइनेंस के प्रमाणपत्र होने चाहिए। गुंडई के बल पर वसूली नहीं की जा सकती है।
-अनुपम कुमार, वरिष्ठ अधिवक्ता, एसबीआई पैनल।
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साहूकारा अधिनियम समाप्त कर दिया गया है। अगर कोई ब्याज पर रुपये देता है तो गलत है। शिकायत मिलने पर ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। जिले में किसी को भी सूद पर रुपये देने का अधिकार नहीं है।
-प्रियंका निरंजन, जिलाधिकारी।