फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Basti News: सचेत रहिए, नजूल की जमीन में भी उलझा देते हैं भू-माफिया

Sun, 07 May 2023 01:15 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
विज्ञापन
लैबुड़वा ताल की जमीन खरीदने के बाद नहीं बनाया जा सका घर।
विज्ञापन
बस्ती। जमीन के कारोबार में बहुत खेल है। भू-माफिया के जाल में फंसे तो फिर उलझते ही जाएंगे। इनके भरोसे जमीन खरीद कर मकान बनाने की हसरत कतई पूरी नहीं होगी। इस तिकड़म में आपके जीवन की गाढ़ी कमाई या कर्ज लेकर जुटाई गई रकम डूब जाएगी। हां, यकीन मानिए ऐसा भी होता है। महंगी दर पर खरीदी गई जमीन बाद में नजूल या अन्य प्रतिबंधित प्रकृति की निकल जाती है।
विज्ञापन

शहर में एक दर्जन से अधिक ऐसे मामले प्रकाश में आ चुके हैं। लोगों ने इधर-उधर से रुपये का बंदोबस्त कर रजिस्ट्री कराई और जब घर बनाने की बारी आई तो ठगा महसूस किए। भू-माफिया के इस खेल में फंसे लोगों की मदद भी किसी सरकारी फोरम में नहीं हो पाती है। जिम्मेदार हाथ खड़े कर लेते हैं।
आजकल जमीन का कारोबार खूब फू-फल रहा है। शहरी क्षेत्र में खाली पड़ी जमीनों पर भू-माफिया की गिद्ध दृष्टि हर समय बनी रहती है। तालाब, पोखरे, बंजर, नजूल, परती, पार्क जैसे प्रतिबंधित प्रकृति के भू-खंड पर इनका कब्जा हो जा रहा है। जिसे बाद में सजा-संवारकर मुंहमांगी रकम पर ग्राहकों को बेच दिया जा रहा है। इस खेल में लैबुड़वा ताल, महदेव ताल, पांडेय पोखरा, बेलवाडाड़ी ताल लुप्त होने के कगार पर पहुंच गए। मिट्टी पाटकर इन भू-खंडों का सौदा खुलेआम हुआ। प्रशासन जब तक सक्रिय होता, तब तक देर हो चुकी थी। अधिकांश भू-खंड पर मकान बन गए तो कई की रकम डूब गई। साजिशकर्ता अलग-थलग हो गए और खरीदार सिर्फ मुकदमे में उलझकर रह गए। इसमें तहसील एवं निबंधन विभाग की भूमिका से इन्कार नहीं किया जा सकता है।
विज्ञापन


केस नंबर- 1
शहर के त्रिपाठी गली के रहने वाले मनोज कुमार श्रीवास्तव ने पांच साल पहले स्टेशन रोड स्थित महदेव ताल में दो बिस्वा जमीन खरीदी। बाद में जब पता चला कि वह भू-खंड भूमिधरी यानी संक्रमणीय नहीं है तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। मकान बनाने की हसरत धरी की धरी रह गई। अब वह जमीन पर कब्जा पाने के लिए तहसील, न्यायालय से लगायत बीडीए तक चक्कर काट रहे हैं।
-
केस नंबर-2
मुंडेरवा के लालबहादुर ने लैबुड़वा ताल में डेढ़ बिस्वा जमीन आठ साल पहले खरीदी। चहारदीवारी भी कराई, लेकिन बाद में तहसील प्रशासन की ओर से उस भू-खंड को नजूल बताकर निर्माण कार्य रोक दिया गया। यहां एक दर्जन भूखंड की रजिस्ट्री होने के बाद निर्माण पर रोक लगी हुई है। लोग रजिस्टी प्रपत्र के आधार पर खारिज-दाखिल एवं कब्जा पाने के लिए न्यायालयों में मुकदमा लड़ रहे हैं। प्रशासन ने अब लैबुड़वा ताल की जमीन की रजिस्ट्री पर ही रोक लगा दी है। यहां अधिकांश भूखंड नजूल, बंजर और नान-जेडए प्रकृति के हैं।
-
केस नंबर-3
भू-माफिया ने शहर के मालवीय रोड स्थित अग्रवाल भवन की कामर्शियल जमीन को कई व्यापारियों के हाथ बेच दिया। इसमें कुछ जेडए और कुछ नान-जेडए भूमि सम्मिलित है। जेडए भूमि के खरीदार तो किसी तरह कब्जा प्राप्त कर लिए हैं, लेकिन कुछ व्यवसायी अब भी निर्माण नहीं करवा पा रहे हैं। वास्तविक भू-स्वामी पिकौरा शिवगुलाम निवासी राधेश्याम शुक्ल, दीनानाथ शुक्ल आदि लोग अपनी नान-जेडए की भूमि को अवैध ढंग से रजिस्ट्री कराए जाने के मामले में मुकदमा लड़ रहे हैं।

ऐसे होता है जमीन में खेल
बंजर, नजूल एवं अन्य ऐसी प्रकृति की जमीनें जो राज्य सरकार के अधीन होती हैं, उस पर भू-माफिया पहले तहसील प्रशासन को मिलाकर आबादी की भूमि में परिवर्तित करा लेते हैं। इससे इन जमीनों की खतौनी जारी हो जाती है। फिर उसी आधार पर प्लाटिंग कर सौदा शुरू हो जाता है। कुछ जगहों पर यदि अगल-बगल काश्तकारों की जमीन है तो उसे खरीदकर उसके साथ सरकारी जमीन भी कब्जा हो जाती है।
-
क्या है नजूल, नान-जेडए और जेडए भूमि
नियमों के अनुरूप जेड-ए (संक्रमणीय) भूमि ही खरीदने योग्य होती हैं। यह जमीन काश्तकार की होती है। नान-जेडए (जमन) यह वह भूमि है, जो कब्जे आधार पर किसी को भी प्रदत्त हो सकती है। लेकिन बेचने का अधिकार संबंधित कब्जेदार के पास नहीं होगा। जमीन का मालिकाना हक संबंधित जमींदार या राजा के ही पास ही रहता है। नजूल भूमि वह होती है, जो किसी के नाम दर्ज है, लेकिन उसका पता नहीं है। यह जमीन भी राज्य सरकार के अधीन होती है। बंजर भूमि सरकारी होती है। इसका निर्धारित शर्तों पर पट्टा भी किया जा सकता है। इसके अलावा पट्टे के आधार पर आवंटित भूमि असंक्रमणीय होती है। इसे बेचा नहीं जा सकता है। लेकिन इस जमीन को आबादी में दर्ज कराकर लोग बेच ले रहे हैं।
-
प्रतिबंधित एवं सरकारी जमीनों की खरीदफरोख्त पर रोक तहसील प्रशासन एवं निबंधन कार्यालय के तालमेल से ही संभव हो सकता है। यदि इस तरह की जमीनों को चिह्नित कर उनका स्पष्ट विवरण प्रत्येक तहसील के निबंधन कार्यालय में उपलब्ध हो जाए तो इस तरह की रजिस्ट्री पर रोक लग सकती है। यह पारदर्शी व्यवस्था बननी चाहिए। -विजय त्रिपाठी, वरिष्ठ अधिवक्ता, सिविल बार, बस्ती।

मेरे स्तर से राज्य सरकार के अधीन आने वाली या नान-जेडए जमीनों की सूची तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। कुछ क्षेत्रों से ऐसी जमीनों की सूची भी आई है। प्रयास करेंगे कि निबंधन कार्यालय में भी इसे उपलब्ध कराया जाए। ताकि इस तरह की जमीनों की रजिस्ट्री न हो सके। -शैलेश दुबे, एसडीएम बस्ती सदर

हमें दिन भर में कई जमीनों की रजिस्ट्री करनी होती है। तत्काल भूमि की प्रकृति की जांच या मौका मुआयना संभव नहीं हो पाता है। यह कार्य क्रेता-विक्रेता को कर लेना चाहिए। फिर यदि स्पष्ट विवरण के साथ जिन जमीनों की रजिस्ट्री पर रोक लगाने का निर्देश मिलेगा, विभाग अवश्य पालन करेगा। -ज्ञानेंद्र कुमार सिंह, उपनिबंधक, बस्ती।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें