केंद्र सरकार की काउंटर सिटी मैग्नेट योजना के तहत बरेली में रिंगरोड प्रस्तावित हुई थी। योजना के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी संभालने वाले बरेली विकास प्राधिकरण ने रिंग रोड के दायरे में आने वाले 192 गांवों की सूची तैयार की थी। इसमें जिला प्रशासन और तब की महानगर पालिका को भी विश्वास में लिया गया था।
गांवों की सूची के साथ तैयार प्रस्ताव की फाइल गोपनीय थी और तीनों विभागों के उच्चाधिकारियों को ही चयनित गांवों और उनमें पड़ने वाले भूखंडों की जानकारी थी। इसके बावजूद कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से भूमाफिया ने रिंग रोड के मार्ग का नक्शा हासिल कर लिया।
भूमाफिया ने कमाए थे करोड़ों
पूरी जानकारी जुटाने के बाद माफिया ने मार्ग में पड़ने वाली जमीन बड़े पैमाने पर औने-पौने दाम में खरीदी ली थी। दो दर्जन से अधिक कॉलोनाइजरों ने करोड़ों में यह जमीन खरीदी थी। कुछ जमीनों का किसानों से एग्रीमेंट हो गया था कि रिंग रोड बनने पर जब जमीन के दाम बढेंगे, तब उसे बेचकर करोड़ों कमाए जाएंगे। हालांकि, बाद में यह योजना परवान नहीं चढ़ सकी, लेकिन भूमाफिया ने करोड़ों कमा लिए।
रूट में बदलाव करके भी हुई कमाई
पुराने जानकार बताते हैं कि काउंटर मैग्नेट सिटी योजना के तहत रिंग रोड न बन पाने के बाद कई बार उसके रूट के प्रस्ताव में बदलाव हुए। हर बार प्राॅपर्टी डीलरों ने लोगों को सब्जबाग दिखाकर ऊंचे दामों पर जमीन की खरीद-फरोख्त की। वर्ष 2003 में बड़ा बाइपास की अधिसूचना जारी हुई थी। हालांकि, वह लगभग दस वर्ष बाद वर्ष 2013 में बनकर तैयार हो सका।
इसके भी प्रस्ताव से लेकर बनने तक आसपास के इलाकों में जमीन की खरीद-फरोख्त मनमाने ढंग से हुई। हालांकि, इस प्रोजेक्ट के अधिग्रहण में जमीन देने वाले हरिनंदन पटेल अभी तक मुआवजे के लिए भटक रहे हैं। उनके अनुसार वह मुआवजे की दरों से संतुष्ट नहीं हैं। इसीलिए उनका अभी तक विवाद चल रहा है।