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Bareilly News: अपने छोड़ गए तो अस्पताल बना वारिस... आठ साल बाद जिंदगी की जंग हारा निशांत

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- इलाज पर 1.30 करोड़ हुए खर्च, 12 वर्ष की उम्र में गुलियन बैरे सिंड्रोम की चपेट में आ गया था निशांत
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बरेली। दुर्लभ बीमारी से जूझ रहे निशांत को मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराने के बाद उसके माता-पिता तक ने उसकी सुध नहीं ली। मामला सुर्खियों में आने पर तत्कालीन डीएम की पहल पर मेडिकल कॉलेज ने आठ साल उसका इलाज किया। करीब 1.30 करोड़ रुपये खर्च हुए। मगर शुक्रवार सुबह निशांत जिंदगी की जंग हार गया।
मिनी बाइपास स्थित अवध धाम काॅलोनी निवासी कांता प्रसाद गंगवार का बेटा निशांत 12 वर्ष की उम्र में गंभीर बीमारी गुलियन बैरे सिंड्रोम से ग्रसित हुआ था। अस्पतालों के चक्कर काटने के बाद जब बेटे की हालत में सुधार नहीं हुआ तो माता-पिता उसको लेकर भोजीपुरा स्थित निजी मेडिकल काॅलेज पहुंचे। वहां जांच के बाद दुर्लभ बीमारी की पुष्टि हुई। इससे निजात मिलने की उम्मीद बेहद कम थी, पर डॉक्टरों ने माता-पिता को हौसला दिया। लंबे समय तक इलाज चलने और इसमें काफी खर्च होने की जानकारी दी गई।
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इस पर निशांत के माता-पिता बगैर सूचना दिए बेटे को अकेला छोड़कर चले गए। तत्कालीन डीएम सुरेंद्र सिंह की पहल पर मेडिकल कॉलेज बीते आठ वर्ष से उसका इलाज करता रहा। इस दौरान एक बार भी अभिभावक उसे देखने नहीं आए। खोजबीन के लिए कॉलेज पुलिस-प्रशासन को पत्र भेजता रहा।
सुबह दी निधन की सूचना, दोपहर में पंचनामे के लिए पहुंची पुलिस
मेडिकल कॉलेज से मिली जानकारी के अनुसार निशांत को 18 सितंबर को कार्डियक अरेस्ट (हृदयाघात) पड़ा था। डॉक्टर उसे बचाने का प्रयास करते रहे, पर शुक्रवार सुबह उसकी सांसें थम गईं। इसके बाद मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने पुलिस और प्रशासन को सूचना देकर मार्गदर्शन मांगा। सुबह दी गई सूचना पर अपराह्न साढ़े तीन बजे भोजीपुरा पुलिस पंचनामा कराने पहुंची। इसके बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया।
ये है गुलियन बैरे सिंड्रोम
मेडिकल कॉलेज के डॉ. आरपी सिंह के मुताबिक गुलियन बैरे सिंड्रोम लाइलाज बीमारी है। इसे आटो इम्यून डिजीज भी कहते हैं। मरीज के शरीर में दर्द के साथ मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं। शरीर लकवाग्रस्त हो जाता है। प्रतिरोधक क्षमता घटती जाती है। तंत्रिकाएं मस्तिष्क के आदेश को नहीं पकड़ पाती। रोगी को चीजों की बनावट पता नहीं चलती। सर्दी, गर्मी का एहसास नहीं होता। शरीर अपाहिज हो जाता है।
अभिभावक ने बदल दिया पता और मोबाइल नंबर
निशांत का निधन होने के बाद अस्पताल प्रशासन ने अभिभावक को कॉल की और मेसेज भेजे, पर मोबाइल नंबर गलत मिला। मेडिकल सुपरिटेंडेंट के मुताबिक इलाज में 1.30 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। उसके माता-पिता ने भर्ती कराते समय जो पता लिखवाया था, अब वे वहां नहीं रहते। घर के साथ ही उन्होंने मोबाइल नंबर भी बदल दिया है। उन्होंने पुलिस द्वारा अंतिम संस्कार कराने की बात कही है।
स्वयंसेवी संगठनों की मदद से कराएंगे अंत्येष्टि
एसडीएम गोविंद मौर्य के मुताबिक उन्हें कॉलेज प्रशासन से सीधे तौर पर कोई सूचना नहीं मिली। दोपहर एक बजे जानकारी मिलने पर सीएमओ को कॉल करके जानकारी ली। भोजीपुरा पुलिस को शव का पंचनामा कराने और पोस्टमार्टम के लिए भेजने के निर्देश दिए। अंतिम संस्कार के लिए स्वयंसेवी संगठनों की मदद ली जाएगी।
अमर उजाला ने हर कदम पर निभाया निशांत का साथ
निशांत के इलाज में आर्थिक अड़चन न आए, इसके लिए अमर उजाला ने लगातार मुहिम चलाई। सामाजिक संगठनों और शहरवासियों ने मदद के लिए हाथ बढ़ाए। प्रकाशित खबरों का संज्ञान लेकर तत्कालीन डीएम सुरेंद्र सिंह ने मेडिकल कॉलेज प्रशासन से संपर्क किया। मेडिकल कॉलेज ने आठ वर्ष तक निशांत का इलाज किया।
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जिस दिन भर्ती हुआ था, उसी दिन मनाते थे जन्मदिन
निशांत का आठ वर्ष से इलाज कर रहीं बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. संध्या चौहान निधन की सूचना से गमगीन रहीं। कहा कि जिस दिन निशांत भर्ती हुआ था, उसी दिन को वे उसका जन्मदिन मनाती थीं। नर्स, डॉक्टर, आईसीयू स्टाफ और निशांत कुछ ऐसे जुड़ गए थे कि परिवार जैसा लगता था। अमर उजाला ब्यूरो
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