बरेली। आजाद भारत में सांस ले रहे लोगों को पता है कि 15 अगस्त 1947 को गुलामी की बेड़ियां टूटी थीं, पर बरेली ब्रिटिश शासनकाल में भी 11 माह स्वतंत्र रहा था। वर्ष 1857 की क्रांति का धुआं मेरठ से उठा और चिंगारी बरेली तक पहुंची। इसके बाद अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए जान की बाजी लगी।
जिला प्रशासन से प्राप्त जानकारी के अनुसार मेरठ छावनी में दस मई 1857 को हुई क्रांति की सूचना बरेली को चार दिन बाद मिली। यहां 31 मई को तोपखाना लाइन में सूबेदार बख्त खान के नेतृत्व में 18वीं और 68वीं देशज रेजिमेंट ने विद्रोह कर दिया। कप्तान ब्राउन को मारने के बाद मकान जला दिया था। फिर टुकड़ियों में बंटकर अंग्रेजों के बंगलों की ओर बढ़ने लगे। सूचना शहर पहुंची तो अंग्रेजों पर हमले शुरू हो गए। 16 अंग्रेज अफसरों को मौत के घाट उतारा गया। इसी दिन शाम चार बजे तक बरेली ब्रिटिश शासकों से आजाद हो गई थी।
मृतक अंग्रेजों में ब्रिगेडियर सिवाल्ड, कप्तान ब्राउन, सार्जेंट वाल्डन, कैप्टन कर्बी, लेफ्टिनेंट फ्रेजर, सेशन जज रेक्स, कर्नल ट्रूप, कैप्टन रॉबर्टसन और जेलर हैंस व अन्य शामिल थे। 32 अफसर नैनीताल भाग गए थे। फिर क्रांतिकारियों ने खान बहादुर खान को रुहेलखंड का नवाब घाेषित किया था।
मई 1858 को फिर अंग्रेजी फौज ने हमलाकर ब्रिटिश शासन को बहाल किया था। कुछ क्रांतिकारियों को पकड़कर मौत की सजा दी थी। खान बहादुर खान नेपाल चले गए थे, पर नेपाल नरेश जंग बहादुर ने उन्हें हिरासत में लेकर अंग्रेजों के सुपुर्द कर दिया। बरेली छावनी में मुकदमा चला। 24 फरवरी 1860 को उन्हें कोतवाली में फांसी दी गई थी। इनके अलावा 257 अन्य क्रांतिकारियों को भी कमिश्नरी के समीप बरगद के पेड़ के नीचे फांसी दी गई थी।
वर्ष 1932 में पंडित नेहरू भी बरेली की जेल में रहे थे बंद
अंग्रेजों ने वर्ष 1841 में सिविल लाइंस में जिला जेल और 1848 में सेंट्रल जेल इज्जतनगर में बनाई थी। तत्कालीन परिस्थिति में इन जेलों में ज्यादातर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और क्रांतिकारी थे। खान बहादुर खान के पार्थिव शरीर को भी 24 फरवरी 1860 को बेड़ियों के साथ जिला जेल में दफन किया था। वहां मजार बनी है। पंडित जवाहर लाल नेहरू भी बरेली की जेल में सात फरवरी 1932 से छह जून 1932 तक कैद रहे थे। खान अब्दुल गफ्फार खां, पंडित गोविंद वल्लभ पंत, सेठ दामोदर स्वरूप, आरएस पंडित, चौधरी बदन सिंह, धर्मदत्त वैद्य समेत कई क्रांतिकारी भी बंद रहे थे।
आजाद देश के संविधान निर्माण में भी बरेली का रहा योगदान
बरेली। विश्व के सबसे बड़े लिखित संविधान के निर्माण में भी बरेली के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का योगदान रहा। संविधान निर्मात्री समिति के लिए देश भर से चुने गए 389 सदस्यों में से दो बरेली के भी थे। ये स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सेठ दामोदर स्वरूप और सतीश चंद्र थे।
चौकी चौराहा स्थित पार्क पर स्थापित प्रतिमा में दर्ज लेख के मुताबिक सेठ दामोदर का जन्म बिहारीपुर, बरेली में 11 फरवरी 1901 को हुआ था। स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने की वजह से वह 15 वर्ष कारागार में रहे। उन्होंने बरेली छावनी विद्रोह, बनारस कांड, जलियांवाला बाग कांड, काकोरी कांड में सक्रिय भूमिका निभाई थी। केंद्रीय असेंबली के लिए निर्वाचित हुए थे। वर्ष 1946-48 तक उप्र कांग्रेस कमेटी के प्रमुख नेता रहे। कई लेखकों ने लिखा है कि संविधान सभा के सदस्य होने पर भी किन्हीं वजहों से उसपर हस्ताक्षर नहीं किए थे। वर्ष 1965 में देहावसान हुआ था।
तीन बार जेल गए, पर नहीं टूटा आजादी का जज्जा
आलमगिरीगंज के रहने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सतीश चंद्र को ब्रिटिश सरकार की खिलाफत और क्रांतिकारियों का सहयोग करने की वजह से अंग्रेजों ने तीन बार जेल में बंद किया था, मगर उनका जज्बा कायम रहा। देश आजाद होने के बाद सतीश चंद्र दो साल तक संविधान सभा के सदस्य रहे। संविधान की स्वीकृति के बाद वर्ष 1950 से 1952 तक अंतरिम संसद के सदस्य रहे। वर्ष 1951 में संसदीय सचिव नियुक्त हुए। वर्ष 1952 में पहली बार और दूसरी बार भी बरेली के सांसद बने। तीसरी बार 1971 में सांसद चुने गए। वह कई मंत्रालयों में उपमंत्री रहे। ब्यूरो