बरेली। श्मशान भूमि में जहां-तहां रखे और पेड़ों की शाखों से लटके सैकड़ों अस्थि कलश गवाह हैं अपनों की बेरुखी के। धार्मिक मान्यता है कि दाह संस्कार के बाद अस्थि विसर्जन, तर्पण और श्राद्ध के बाद ही मोक्ष मिलता है पर सैकड़ों लोगों को मरने के साल भर बाद भी मोक्ष नहीं मिल सका है। श्मशान भूमि ट्रस्ट ने उनके परिजन से संपर्क किया तो कई आए भी पर कुछ लोगों ने अनसुना कर दिया।
अस्थि कलशों की पड़ताल के लिए शुक्रवार को अमर उजाला की टीम गुलाबबाड़ी श्मशान भूमि पहुंची। यहां करीब डेढ़ सौ अस्थि कलश रखे हैं। इनमें से करीब 50 अस्थि कलश ऐसे हैं, जो छह महीने से ज्यादा पहले हैं। बाकी इसके बाद के हैं। गुलाबबाड़ी श्मशान भूमि ट्रस्ट समिति के परिसर प्रभारी गिरीश चंद्र सिन्हा ने बताया कि कुछ लोग तो दाह संस्कार के तीसरे दिन आकर फूल चुन ले जाते हैं और धार्मिक मान्यता के तहत विसर्जित कर देते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग जल्द आकर ले जाने की बात कहकर अस्थियां रखवा देते हैं।
इनमें से कुछ लोग वापस ही नहीं आते। छह माह तक इंतजार के बाद ऐसे अस्थि कलश समाजसेवी विसर्जित कर देेते हैं। छह माह पहले के अस्थि कलशों का 25 सितंबर को पितृपक्ष के आखिरी दिन एक संस्था ने विसर्जन करने का निर्णय लिया है। अगर किसी परिजन को अस्थि कलश ले जाना है, तो आकर ले जा सकता है। जल्द ही श्मशान भूमि की ओर से अस्थियां सुरक्षित रखने का समय दो माह निर्धारित कर दिया जाएगा। इसके बाद अस्थि कलश किसी संस्था या समाजसेवी से विसर्जित करा दिए जाएंगे।
हरिद्वार में विसर्जित होंगे डेढ़ सौ अस्थि कलश
संजयनगर श्मशान भूमि में करीब डेढ़ सौ अस्थि कलश छह माह पहले से रखे हैं। श्मशान भूमि ट्रस्ट के महामंत्री महेंद्र पटेल ने बताया कि कीर्ति नगर के रहने वाले राजेंद्र और उनकी पत्नी नीलम विज्जन ने इन अस्थियों को विसर्जित करने का संकल्प लिया था। आठ सितंबर को विसर्जन होना तय था पर किन्हीं वजहों से तिथि टल गई। अब शनिवार सुबह पांच बजे अस्थि कलश वाहन में भरकर हरिद्वार ले जाएंगे। वहीं विधि विधान के साथ विसर्जित करेंगे। बताया कि दाह संस्कार के बाद परिजन मृत्यु का प्रमाणपत्र तो लेने के लिए आते हैं पर अस्थि कलश नहीं ले जाते हैं।
पितृपक्ष में ही कलश विसर्जित कर दिए जाएंगे
सिटी श्मशान भूमि में भी बड़ी तादाद में पेड़ों की डाल और स्टोर में अस्थियों की पोटली रखी हैं। इन पर लोगों के नाम लिखे हैं। कई अस्थि कलश नए तो कई पिछले साल और कुछ 2020 के भी हैं। इनका अब तक विसर्जन नहीं किया गया है। ट्र्रस्ट पदाधिकारियों के मुताबिक तीन सालों से लगातार समाज सेवी उन अस्थियों का विसर्जन कर रहे हैं, जिन्हें परिजन नहीं ले जाते हैं। पितरों को मोक्ष दिलाने के लिए अब भी परिजन इन अस्थि कलशों की सुध नहीं ले रहे हैं। छह माह पुराने अस्थि कलश इसी पितृ पक्ष में विसर्जित कर दिए जाएंगे।
श्राद्ध पक्ष आज से, रामगंगा तट पर होगा पिंडदान
देव, ऋषि और पितृ ऋण, शास्त्रों में मनुष्य के ये तीन ऋण कहे गए हैं। पितृ ऋण श्राद्धकर्म से उतरता है। आचार्य सौरभ शंखधार के मुताबिक ब्रह्मपुराण के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में यमराज यमपुरी से पितरों को मुक्त कर अपनी संतान से पिंडदान लेने पृथ्वी पर भेजते हैं। सूर्य के कन्या राशि में होने की वजह से इसे कनागत भी कहते हैं। मान्यता है कि पितृ पृथ्वी पर आकर अमावस्या तक घर के द्वार पर ठहरते हैं। श्राद्ध पक्ष 10 सितंबर यानी शनिवार से 25 सितंबर तक रहेगा। सोलह दिनों में पितरों का तर्पण और विशेष तिथि पर श्राद्ध करना चाहिए।
यह भी जानें
शास्त्रों के मुताबिक श्राद्ध 12 प्रकार के होते हैं। नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि, सापिंड, पार्वण, गोष्ठ, शुद्धि, कर्माग, दैविक, औपचारिक और सांवत्सरिक। सभी श्राद्धों में सांवत्सरिक श्राद्ध श्रेष्ठ है। इसे देहावसान की तिथि पर करना चाहिए। आचार्य के मुताबिक श्राद्ध में लोहे के पात्र का प्रयोग वर्जित है। सोने, चांदी, कांसे या तांबे के पात्र का ही प्रयोग किया जाता है। केले के पत्ते में श्राद्ध का भोजन सर्वथा निषिद्घ है। मुख्य रूप से श्राद्ध में चांदी को विशेष महत्व दिया गया है। मुहूर्त ज्योतिष के अनुसार अपराह्न पितृ कार्य, पूर्वाह्न देव कार्य के लिए माना गया है।