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Bareilly News: बातें अधिकारों की... मगर खुद हकीकत से कोसों दूर

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बरेली। समाज और चुनाव में महिलाओं की भागीदारी व उनकी आर्थिक स्थिति का विशेष प्रभाव होता है। पिछले वर्षों में चुनावों में मतदाता के रूप में महिलाओं की भूमिका बढ़ी है। चुनाव लड़ने में भी आरक्षण तय होने से महिलाएं सदन भी पहुंची हैं। मगर जहां आरक्षण लागू नहीं हैं, वहां कोई दबाव नहीं है। वहां राजनीतिक दलों के पदों पर महिलाएं नहीं दिखाई देतीं। हैं भी तो न के बराबर। यही राजनीतिक दल समाज के मुद्दों व लोगों के अधिकारों की बात को लेकर मुद्दे उठाते हैं। खुद महिलाओं को उनकी संख्या के मुताबिक हिस्सेदारी नहीं दे रहे हैं।
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प्रमुख राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस की बात करें तो यहां किसी भी दल के मुख्य संगठन में महिलाओं को उनकी हिस्सेदारी के हिसाब से पद नहीं मिले हैं। बसपा और सपा के मुख्य जिला संगठन में तो कोई महिला पदाधिकारी ही नहीं है। यहां संख्या शून्य है। भाजपा में तीन और कांग्रेस में छह पदाधिकारी महिलाएं हैं। यह हिस्सेदारी के हिसाब से बहुत कम है। भाजपा में जिला उपाध्यक्ष के पद पर चंचल गंगवार, जिला मंत्री के पद पर नेहा कनौजिया व मंजू कोरी हैं। कांग्रेस में जिला उपाध्यक्ष डॉ. नाहिद सुल्ताना, पाकीजा खान व मिथलेश कश्यप जिला महासचिव के पद पर हैं। ऊरूज फातिमा, शायमा खान व जुबैदा बेगम जिला सचिव के पद पर हैं। इन सवालों पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं होती हैं कि उनके यहां प्रदेश से लेकर जिला स्तर तक महिला विंग हैं और उसमें सभी महिला पदाधिकारी ही हैं।




महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने की बात तो लंबे समय से हो रही है, मगर सही मायनों में इसे पाने के लिए जद्दोजहद अब भी जारी है। तीन तलाक पीड़िताओं को न्याय के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। समाज का विरोध भी झेलना पड़ा। तमाम समस्याओं को झेलते हुए उन्हें न्याय मिला। अब तीन तलाक पर कानून भी बन गया तो वही पीड़िताएं अब दूसरी महिलाओं के अधिकाराें के लिए भी लड़ रही हैं। आला हजरत हेल्पिंग सोसायटी की अध्यक्ष निदा खान और मेरा हक फाउंडेशन की अध्यक्ष फरहत नकवी दोनों ही महिला अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करती रहती हैं।
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अब स्थितियों में काफी सुधार है। महिलाएं अपने हक के लिए लड़ना सीख गई हैं। तीन तलाक कानून ने मुस्लिम समाज की महिलाओं को बहुत संबल दिया है। मैं खुद परेशान हुई। पहले तो खुद की लड़ाई लड़ी। बाद में कई महिलाएं मदद के लिए उनके पास आने लगीं तो उनके हक की आवाज उठाने के लिए मैंने आठ मार्च 2015 को मेरा हक फाउंडेशन की नींव रखी। इसमें कई उद्यमी, अधिवक्ताओं को जोड़ा जो महिलाओं के हक में कोर्ट में पैरवी के लिए काम आते हैं।
- फरहत नकवी, अध्यक्ष, मेरा हक फाउंडेशन

तीन तलाक के विरोध में जो लड़ाई लड़ी, उसमें काफी अड़चनें आईं। धमकियां मिलीं। कई परेशानियां खुद और परिवार ने झेलीं। मगर एक अगस्त 2019 को तीन तलाक पर कानून बन गया तो सफलता का अहसास हुआ। वर्ष 2015 में शादी के कुछ महीनों बाद ही मेरा तलाक हो गया और यहीं से संघर्षों की कहानी शुरू हो गई। खुद को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ते-लड़ते अन्य महिलाओं के हक के लिए लड़ना शुरू किया। अब तक सैंकड़ों महिलाओं को न्याय दिला चुकी हूं। वर्ष 2018 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महिलाओं के हक की लड़ाई के लिए देवी पुरस्कार से सम्मानित किया। इसी दौरान उन्होंने आला हजरत हेल्पिंग सोसायटी बनाई। महिलाओं को न्याय दिलाने के साथ ही आज उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए भी काम कर रही हूं।
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- निदा खान, अध्यक्ष, आला हजरत हेल्पिंग सोसायटी
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