बरेली। दरगाह आला हजरत पर ताजुश्शरिया मुफ्ती अख्तर रजा कादरी का उर्स दरगाह प्रमुख मौलाना सुब्हानी मियां की सरपरस्ती व सज्जादानशीन मुफ्ती अहसन रजा कादरी की सदारत में मनाया गया। इसमें मुफ्ती अय्यूब खान नूरी ने कहा कि अपने दौर में हक की सबसे मजबूत आवाज का नाम ताजुश्शरिया है। उन्होंनें ताउम्र नबी-ए-करीम के बताए रास्ते पर चलते हुए मजहब व मसलक की खिदमात की। दूसरे उलमा ने भी उनके जीवन पर रोशनी डाली। शाम सात बजे फातिहा के बाद सज्जादानशीन ने दुआ की। निजामत कारी इरशादुल कादरी ने की। शाहिद नूरी, नासिर कुरैशी, हाजी जावेद खान, औरंगजेब नूरी, मंजूर रजा आदि ने व्यवस्था संभाली।
बेटियों को करें पर्दे की ताकीद : अहसन मिया्ं
सज्जादानशीन अहसन मियां ने कहा कि पर्दा इस्लाम का अहम हिस्सा है। हम बहन-बेटियों को इसकी ताकीद करें। जो बच्चियां स्कूल-कॉलेज में पढ़ती हैं, उनकी तालीम का वही तरीका अख्तियार करें जो शरीयत की नजर में जायज हो। बच्चियों का खास ख्याल रखें। बेटियों को दहेज नहीं, विरासत में हिस्सा दें। दरगाह स्थित काशाना-ए-नूरी में भी ट्रस्ट के अध्यक्ष अल्लामा मोहतशिम रजा खान की सरपरस्ती में महफिल सजाई गई। कुल शरीफ की रस्म के बाद दुआ की गई। मोहतशिम मियां ने हुजूर नबी-ए-करीम और साहबा इकराम के तबर्रुकात की जियारत कराई। इस मौके पर साहबजादे जकवान रजा, हैयान रजा के अलावा सैयद असद अली, शमशाद नूरी, डॉ. अमत उल्लाह खान, कलीम कुरैशी, उवैस खान मौजूद रहे।
दरगाह पर की चादरपोशी
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दरगाह शाहदाना वली वेलफेयर सोसाइटी की ओर से मुतवल्ली अब्दुल वाजिद खां नूरी की सरपरस्ती में चादर पेश कर गुलपोशी की गई। काजी-ए-हिंदुस्तान मुफ्ती असजद रजा खां कादरी को उर्स की मुबारक दी गई। इधर, समाजवादी अल्पसंख्यक सभा की ओर से जिलाध्यक्ष असलम खान के नेतृत्व में चादरपोशी कर दुआ मांगी गई।
आरएसी मुख्यालय पर भी सजाई महफिल
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ऑल इंडिया रजा एक्शन कमेटी (आरएसी) के मुख्यालय बैतुर्रजा में ताजुश्शरिया के उर्स की महफिल सजाई गई।आरएसी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अदनान रजा कादरी ने हुजूर ताजुश्शरिया के जीवन पर रोशनी डाली। तकरीर अफरोज रजा कादरी की सरपरस्ती और मौलाना अदनान रजा की सदारत में हुई। आरएसी की टीमों ने दरगाह ताजुश्शरिया पहुंचकर चादरपोशी की। शाम को कुल शरीफ की फातेहा के बाद दुआ की गई।
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असजद मियां से मुरीद हुए तमाम जायरीन
ताजुश्शरिया के उर्स में शिरकत करने आए जायरीन काजी-ए-हिंदुस्तान मुफ्ती असजद रजा खां कादरी से मुरीद हुए। कुल के बाद उनकी वापसी का सिलसिला भी शुरू हो गया।