बरेली। मुस्लिम मतों को रिझाने के लिए राजनीतिक पार्टियां एड़ी-चोटी का जोर तो लगा रही हैं पर मुस्लिम चेहरों पर भरोसा जताने के मामले में पीछे हैं। बरेली मंडल की पांच और लखीमपुर खीरी की दो लोकसभा सीटों पर पिछले पांच चुनावों में प्रमुख राजनीतिक दलों ने सिर्फ 20 मुस्लिम प्रत्याशियों को ही मौका दिया है। इसमें भी कई चेहरे ऐसे हैं, जिन्हें कई बार मौका मिला। इनमें भी जीत महज दो को ही मिल पाई।
25 वर्षों की सियासत में भाजपा ने इन सात सीटों पर एक भी मुस्लिम प्रत्याशी नहीं उतारा। सपा, कांग्रेस और बसपा ने मौका तो दिया, मगर उनकी ओर से भी ज्यादा तवज्जो नहीं मिली। जातीय समीकरणों को साधने पर सियासी दलों का पूरा जोर रहा। सात लोकसभा सीटों पर बीते पांच चुनावों में बसपा ने सर्वाधिक नौ मुस्लिम प्रत्याशियों को मैदान में उतारा। कांग्रेस ने छह और सपा ने पांच मुस्लिम प्रत्याशियों को मौका दिया। इस दौरान बदायूं से सपा के सलीम इकबाल शेरवानी और लखीमपुर खीरी से कांग्रेस के जफर अली नकवी ही संसद तक पहुंच सके।
बरेली में सपा ने दो बार जताया भरोसा
बरेली लोकसभा सीट पर समाजवादी पार्टी ने दो मुस्लिम प्रत्याशियों को मौका दिया। वर्ष 2004 इस्लाम साबिर और 2014 में आयशा इस्लाम को प्रत्याशी बनाया। बसपा ने तीन मुस्लिम प्रत्याशियों पर दांव लगाया। वर्ष 2009 में इस्लाम साबिर, 2004 में अकबर अहमद डंपी और 1999 में फारुकल हसन को मौका दिया। वर्ष 1999 में कांग्रेस के टिकट पर भी इस्लाम साबिर अपनी किस्मत आजमा चुके हैं। इनमें से किसी को भी जीत मयस्सर नहीं हुई।
पीलीभीत में सपा और बसपा ने दिया मौका
पीलीभीत लोकसभा सीट पर सपा और बसपा ने मुस्लिम प्रत्याशी उतारे। बसपा ने वर्ष 2004 व 2014 में अनीस अहमद उर्फ फूल बाबू को टिकट दिया था। उधर, सपा ने वर्ष 2009 में रियाज अहमद को मैदान में उतारा था। 25 वर्ष में कांग्रेस ने एक भी मुस्लिम प्रत्याशी इस सीट पर नहीं उतारा।
आंवला में कांग्रेस ने दिया दो बार मौका
आंवला लोकसभा सीट पर सपा और बसपा की ओर से मुस्लिम चेहरे को मौका नहीं दिया गया। कांग्रेस ने इस सीट पर दो बार मुसलमान प्रत्याशी उतारा। वर्ष 2014 में कांग्रेस ने पूर्व सांसद सलीम इकबाल शेरवानी और 2004 में अलाउद्दीन खान को टिकट दिया। दोनों ही जीत से दूर ही रह गए।
शेरवानी पहले कांग्रेस और फिर सपा से जीते
बदायूं लोकसभा सीट पर सलीम इकबाल शेरवानी वर्ष 1999 और 2004 में सपा के टिकट पर सांसद चुने गए। इससे पहले 1984 में वह कांग्रेस के टिकट पर भी संसद पहुंच चुके हैं। हालांकि, नए समीकरण में वर्ष 2009 और 2019 में कांग्रेस ने उन्हें मैदान में उतारा तो वे जीत से दूर रह गए। वर्ष 2014 में बसपा अकमल खान उर्फ चमन को भी मौका दे चुकी है।
शाहजहांपुर सीट पर कोई मुस्लिम प्रत्याशी नहीं
वर्ष 2009 में सुरक्षित हो चुकी शाहजहांपुर सीट पर पिछले 25 वर्ष में किसी भी प्रमुख दल ने मुस्लिम प्रत्याशी को नहीं उतारा। हाई प्रोफाइल रही इस सीट पर कुंवर जितेंद्र प्रसाद कई बार सांसद बने। भाजपा के दिग्गज नेता सुरेश खन्ना भी इस सीट पर हार का मुंह देख चुके हैं।
इलियासी को हराकर जफर बने थे सांसद
लखीमपुर खीरी सीट पर कांग्रेस ने जफर अली नकवी को तीन बार मौका दिया। उन्होंने वर्ष 2009 में बसपा के इलियास आजमी को हराया था। इसके बाद वर्ष 2014 और 2019 में जफर को हार का मुंह देखना पड़ा। बसपा ने दाउद अहमद पर भी पर दांव चला था। 25 वर्ष में इस सीट से यही दो मुस्लिम चेहरे ही चुनावी मैदान में दिखाई दिए। इस सीट पर वर्ष 2004 में भाजपा के फायरब्रांड नेता रहे विनय कटियार को हार का मुंह देखना पड़ा था।
धौरहरा में दो बार मिला मौका
वर्ष 2009 में अस्तित्व में आई धौरहरा लोकसभा सीट पर दो बार मुस्लिम प्रत्याशी प्रमुख दलों के टिकट पर मैदान में आए। वर्ष 2019 में बसपा से अरशद इलियास सिद्दकी और वर्ष 2014 में बसपा के टिकट पर ही दाउद अहमद भाग्य आजमा चुके हैं।