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कारसेवा के साक्षी: बहनों ने रक्त तिलक लगाकर कारसेवकों को किया था विदा, बोले- अयोध्या पहुंचे तो भयावह था दृश्य

Tue, 09 Jan 2024 03:57 PM IST
मुकेश कुमार संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली

सार

कारसेवक धीरेंद्र ने बताया कि अयोध्या में उस वक्त परिस्थितियां ऐसी थीं कि किसी को अंदाजा भी नहीं था कि जान बचेगी भी या नहीं। लेकिन सबके मन में यह संकल्प था कि मंदिर तो वहीं बनाएंगे। इस संकल्प के साथ संघर्ष जारी रखा। 
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कारसेवक धीरेंद्र - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अयोध्या में रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की खुशी और आंदोलन के समय की स्मृतियां 59 वर्ष के धीरेंद्र की आंखों में साफ दिखाई देती हैं। 33 साल पहले किए गए संघर्ष को याद कर वह भावुक हो जाते हैं। धीरेंद्र बताते हैं कि उस समय कारसेवकों पर बहुत सख्ती थी। जब वह श्रीराम मंदिर आंदोलन से जुड़े तो घरवाले हमेशा चिंतित रहते थे। कारसेवा के लिए जब वह अयोध्या जा रहे थे तो बहनों ने अंगूठे के रक्त से तिलक कर उनको विदा किया था और उनके सफल होने की कामना की थी।

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बरेली के चौधरी मोहल्ला, गुलाब नगर निवासी कारसेवक धीरेंद्र ने बताया कि वर्ष 1990 में वह बरेली कॉलेज से बीकॉम की पढ़ाई कर रहे थे। हिंदूवादी संगठनों के आह्वान पर शहर से कारसेवक अयोध्या जाने के लिए तैयार हुए। सभी युवा थे। परिस्थितियां ऐसी थीं कि किसी को अंदाजा भी नहीं था कि जान बचेगी भी या नहीं। वहीं, सबके मन में यह संकल्प था कि मंदिर तो वहीं बनाएंगे।

साढ़े तीन घंटे पेड़ पर बैठे रहे
धीरेंद्र बताते हैं कि वे सभी गांव-गांव होते हुए 13 किलोमीटर पैदल चलकर अयोध्या की सीमा तक पहुंचे थे। वहां देखा कि गलियों में कंटीले तार पड़े हुए थे। पुलिस का भी सख्त पहरा था। बचने के लिए कारसेवक पास के पेड़ पर चढ़ गए थे। साढ़े तीन घंटे बाद जब पुलिस चली गई तो सभी नीचे उतरे। कई दिनों तक भूखे भी रहे। परिवार से भी संपर्क नहीं हो पा रहा था। बाद में पता चला कि पुलिस परिवारवालों को भी परेशान कर रही थी। बताया कि अयोध्या पहुंच कर भयानक दृश्य देखने को मिला।

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विधायक के घर से हुए थे गिरफ्तार
धीरेंद्र ने बताया कि अयोध्या से लौटते समय तत्कालीन नगर विधायक डॉ. दिनेश जौहरी के घर पहुंचे थे। वहां दीवार फांदकर पहुंची पुलिस ने विधायक समेत 61 कारसेवकों को गिरफ्तार कर लिया था। इसमें वह भी शामिल थे। सभी को शाहजहांपुर जेल में रखा गया था। 24 दिनों बाद उन्हें छोड़ा गया था। 

उन्होंने बताया कि गुलाब नगर स्थित उनके आवास पर गुपचुप तरीके से कार्यकर्ताओं की बैठकें होती थीं। कई बार पुलिस के आने से पहले आयोजन स्थल बदल दिया जाता था। कई -कई दिनों तक कारसेवक भूमिगत हो जाते थे। पत्रों के माध्यम से एक-दूसरे को स्थितियों के बारे में अवगत कराया जाता था।

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