संजीव सक्सेना के नामांकन वापसी के बाद सपा संगठन के सभी पदाधिकारियों ने डॉ. आईएस तोमर के कार्यालय पर बैठना शुरू किया। इसके बाद चुनाव प्रचार शुरू हुआ। सपा मुखिया के आने की चर्चाएं तेज हुईं मगर वह अंत तक नहीं आए। सपा के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि पहले तो बिना सिंबल उतरे और दूसरा अखिलेश यादव भी नहीं आए। इससे कार्यकर्ताओं में अच्छा संदेश नहीं गया तो पार्टी को जीत कैसे मिलती।
प्रचार के तरीके से भी हुआ नुकसान
सपा ने जिस तरह जनसंपर्क किया, वह भी इस हार का मुख्य कारण बनी। डॉ. आईएस तोमर के साथ कम मौकों पर ही सपा के बड़े नेता प्रचार में दिखाई दे रहे थे। सपा के बड़े नेता पूरी टीम के साथ अलग-अलग वार्डों में प्रचार कर रहे थे तो डॉ. तोमर टीम के साथ अलग वार्डों में शुरुआत करते थे। कई बार साथ भी होते थे। सपा के नेता प्रचार के दौरान सपा का झंडा साथ रखते थे जबकि डॉ. तोमर पीले रंग का झंडा लेकर चल रहे थे, जिस पर जीप बनी हुई थी। इससे भी मतदाताओं में भ्रम की स्थिति रही।
मतदान से ठीक एक सप्ताह पहले तक लड़ाई भाजपा बनाम सपा रही ही नहीं। यह लड़ाई उमेश गौतम और डॉ. आईएस तोमर की हो गई। इससे सपा का कैडर वोट भी छिटका और मुस्लिम मतों में भी बिखराव हो गया। सपा के एक प्रदेश स्तरीय नेता ने माना कि डॉ. तोमर प्रचार में सपा का झंडा साथ लेकर नहीं चले, यह नुकसान का प्रमुख कारण रहा।
प्रदेश अध्यक्ष ने नहीं की समीक्षा
सपा के जो बड़े नेता आए, वह भी पार्टी की लाइन पर नहीं चले। सपा प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल बरेली पहुंचे तो उन्होंने चुनाव की कोई समीक्षा बैठक नहीं की। प्रत्याशी को लेकर कोई प्रेसवार्ता नहीं की। लोहिया वाहिनी के निवर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रदीप तिवारी, छात्र सभा के प्रदेश अध्यक्ष दिग्विजय सिंह देव और पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता नेहा यादव चुनाव में जब तक बरेली रहीं, सिर्फ पार्टी नेताओं के साथ जनसंपर्क किया। इन लोगों की ओर से भी कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं दिखाई दिए। जिलाध्यक्ष और महानगर अध्यक्ष कमेटियां तक नहीं बना सके।
मुस्लिम मतदाताओं को साधने के नहीं हुए प्रयास
सपा मुस्लिम मतदाताओं को अपना मानकर चल रही थी। पूरे चुनाव में इस वर्ग को साधने के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए। किसी भी मुस्लिम नेता को प्रचार में नहीं भेजा गया। इसके अलावा अलग-अलग बिरादरी के नेताओं को बुलाकर कोई नुक्कड़ सभा नहीं कराई गई।