13 साल में पहला फतवा लिखा
आठ वर्ष की उम्र में ‘हिदायतुन्ह’ की किताब का अरबी में अनुवाद किया। 1869 ईसवीं में मात्र 13 साल 4 माह 10 दिन में पहला फतवा मां के दूध के हवाले से लिखा। उसी दिन फतवानवीसी का आगाज किया, जो 1921 ईसवीं तक जारी रहा। आज भी लोग सारी दुनिया में फतावा रजविया से फैज हासिल कर रहे हैं। यह मुसलमानों में खास मुकाम रखती है। इनकी विद्वता को इस वक्त के अरब व अजम के मशहूर उलेमा ने स्वीकार किया। इनकी शान में बेहतरीन शब्दों का प्रयोग किया।
फतवों में नमाज, रोजा, जकात, हज, तहारत यानि पाकी का बयान, तलाक, निकाह, संपत्ति, बैंकिंग, फोनोग्राम में आवाज सुनने का शरई हुक्म, इल्म-ए-गैब, करेंसी नोट, राजनीतिक मसलों पर भी बेशुमार शरई फैसले, बीमा समेत लाखों फतवे लिखे, जिसका ताल्लुक आज की रोजमर्रा जिंदगी से है। मोहम्मद अहमद बड़े लेखक, शायर, मुफ्ती, मुहद्दिस, आलिम, हाफिज, भाषाविद, समाज सुधारक के साथ कुरान, हदीस, उसूले हदीस, फिकह, तफ्सीर, अकाइद भी थे। अपना उपनाम ‘रजा’ लिखते थे।