आज जहां एक ओर देश में हर लोकसभा सीट पर सरकार व विपक्ष के प्रत्याशी लाखों रुपया खर्च करते हैं, वहीं तीन दशक पहले तक की राजनीति में चुनाव इतने महंगे नहीं थे। कई उम्मीदवार लोकसभा चुनाव नाम मात्र के खर्च पर लड़ लेते थे। ऐसे ही भाजपा के टिकट पर सांसद बने राजवीर सिंह ने भी चुनाव लड़ा था। वह अपनी चुनावी सभाओं में जनता से वोटों के साथ चुनावी खर्च के लिए नोट भी मांगते थे।
राजवीर सिंह 1989, 1991 व 1998 के चुनावों में भाजपा की ओर से लोकसभा सांसद रहे। इन चुनावों से पहले उन्होंने जनसंघ पार्टी के जिलाध्यक्ष सहित कई पदों की जिम्मेदारी भी संभाली थी। भाजपा गठन के बाद उनको राष्ट्रीय व प्रांत स्तर की कई जिम्मेदारियां सौंपी गईं। उनके पूरे राजनीतिक जीवन में उनकी सादगी और कड़क मिजाज चर्चा में रहता था।
वर्ष 1989 के चुनाव में तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी जब चुनाव सभा के लिए आंवला आए तो दो स्थानों पर उनकी बिना तामझाम के सभाएं आयोजित हुईं। एक सभा तो गांव में पेड़ के नीचे बड़े चबूतरे पर हुई थी। सुभाष इंटर काॅलेज के मैदान में भाजपा के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी की सभा में उन्होंने जनता से वोटों के साथ चुनावी खर्चे के लिए चंदा देने की भी अपील की थी। इसके साथ ही मंच के नीचे कई कार्यकर्ता झोली फैलाकर चंदा एकत्र करते देखे गए थे। वाजपेयी ने अपने भाषण में चंदा लेने के इस ढंग पर चुटकी ली थी।
पूर्व सांसद स्व. राजवीर सिंह के बेटे धीरू सिंह ने बताया कि ''''पापा जब भी चुनाव लड़ते थे तो घर में चुनावी खर्चे को लेकर कोई समस्या खड़ी नहीं होती थी। हर विधानसभा क्षेत्र के पार्टी कार्यालय में दिन भर चंदे में मिली राशि जमा करा दी जाती थी और उस दौर में उसी से कार्यालय का खर्च चल जाता था।''''