बरेली। दिवाली पर जगमगाती झालरें, दीपक, मिठाइयां और पकवान के साथ आतिशबाजी से हर तरफ खुशियां बिखरती हैं लेकिन इस बीच सेहत के प्रति बेपरवाही से भारी भी पड़ सकती है। डॉक्टरों का कहना है कि पटाखों का धुआं और शोर से गंभीर रोगों का भी शिकार बना सकता है लिहाजा जरूरी है कि संभलकर और कम आतिशबाजी की जाए।
बरेली कॉलेज में बॉटनी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. आलोक खरे के मुताबिक पटाखों से पर्यावरण को तो नुकसान पहुंचता ही है, उनसे निकलने वाली गैसों से कई रोगों का भी खतरा बढ़ जाता है। बरेली पहले से ही नॉन अटेनमेंट सिटी यानी प्रदेश के प्रदूषित शहरों की सूची में है लिहाजा यहां दूषित पर्यावरण का खतरा सभी पर मंडरा रहा है। स्वच्छ पर्यावरण के लिए लोगों से तेज आवाज और ज्वलनशील पटाखों के बजाय हल्की आवाज और रोशनी बिखेरने वाले पटाखे चलाने चाहिए। पर्यावरण से बचाव के लिए एहतियात बेहद जरूरी है।
सुनने की क्षमता को प्रभावित करता है पटाखों का शोर : जिला अस्पताल के ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. एलके सक्सेना के मुताबिक पटाखों से होने वाला धमाका और रोशनी का कान के पर्दों और आंखों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। कान के पास तेज आवाज होने से सर्वाधिक समस्याएं होती हैं। टॉक्सिन से आंखों में जलन और पानी निकलने की समस्या बढ़ती है। इसलिए आतिशबाजी के दौरान आंखों को बचाएं, बगैर धोएं न सोएं। बारुद लगे हाथ से आंख न साफ करें।
ब्लड प्रेशर और हृदय गति बढ़ने की आशंका : पटाखों की हानिकारक गैसों से दिल की बीमारियों की आशंका बढ़ती है। जो पहले से दिल के मरीज हैं, पटाखों की तेज आवाज से उन्हें दिल का दौरा पड़ सकता है। हानिकारक गैसों के कारण सांस अटकने की समस्या हो सकती है। पटाखों में मौजूद मरकरी से ऐसी गैसें निकलती हैं, जो सांस की बीमारी और बीपी बढ़ा सकती हैं। किसी को पहले से बीपी की समस्या है, तो वे सावधान रहें।
कैंसर, दमा और अल्जाइमर जैसे खतरे छिपे हैं इस धुएं में
आईएमए प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. रवीश अग्रवाल के मुताबिक पटाखे में पोटैशियम क्लोरेट, गन पाउडर से तेज धमाका और रोशनी होती है। इस केमिकल से निकलने वाले धुएं से फेफड़ों का कैंसर होने का खतरा रहता है। फेफड़ों की बीमारी से ग्रसित व्यक्ति की हालत और भी गंभीर हो सकती है। यह गैस एसिड रेन यानी अम्लीयबारिश) की भी वजह बनती हैं। कार्बन डाई ऑक्साइड से दमा की बीमारी बढ़ सकती है। पटाखों में एल्युमिनियम सफेद रोशनी करता है लेकिन यह डर्मेटाइटिस बीमारी का शिकार भी बना सकता है। गैस बच्चों के दिमाग को प्रभावित कर उन्हें अल्जाइमर की चपेट में ला सकती हैं।
गर्भवती महिलाओं और बच्चों का आतिशबाजी से दूर रहना बेहतर
डॉ. अग्रवाल के मुताबिक आतिशबाजी से गर्भवती महिलाओं और बच्चों को दूर रहना चाहिए। कार्बन मोनोऑक्साइड गैस शरीर में प्रवेश कर गर्भ में पल रहे बच्चे में भी सांस और दूसरे विकारों की वजह बन सकती है। बच्चों की त्वचा नाजुक होती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता कम। इसलिए बच्चों को ऐसे तेज आवाज और धुआं छोड़ने वाले पटाखों से दूर रखना चाहिए। ये तमाम हानिकारक गैस गर्भपात की वजह भी बन सकती है।