बरेली। रिंग रोड और बरेली-सितारगंज हाईवे का एलाइनमेंट लीक होने से लेकर मुआवजा तय करने तक अधिकारियों-कर्मचारियों और अभियंताओं ने कदम-कदम पर लापरवाही की। कुछ लोगों को लाभ पहुंचाकर सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का चूना लगाया। डीएम और कमिश्नर की ओर से कराई गई प्रारंभिक जांच में 80 करोड़ का घोटाला सामने आ चुका है। इस प्रकरण में शासन ने मंगलवार को दो भूमि अध्याप्ति अधिकारियों, दो लेखपालों और एक अमीन को निलंबित कर दिया।
भूमि अध्याप्ति अधिकारी आशीष कुमार और मदनपाल, सदर तहसील के लेखपाल उमाशंकर, नवाबगंज तहसील के सुरेश सक्सेना और भूमि अध्याप्ति अधिकारी के अमीन डंबर सिंह निलंबित हुए हैं। अमीन और लेखपाल ज्वाइंट मेजरमेंट सर्वे की टीम का हिस्सा थे। इनकी रिपोर्ट पर परिसंपत्तियों के मूल्यांकन हुए थे और मूल्यांकन रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन भूमि अध्याप्ति अधिकारियों ने मुआवजा तय कर दिया था।
इन लोगों ने जिम्मेदारी निभाई होती तो अधिक मुआवजा न देना पड़ता। सरकारी खजाने को होने वाली क्षति को रोका जा सकता था। सीडीओ की जिस जांच रिपोर्ट पर अब तक दस अधिकारी-कर्मचारी और अभियंता निलंबित हुए हैं, उसमें 21.52 करोड़ रुपये का घोटाला सामने आया था। मंडलायुक्त की ओर से भेजी गई जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई होना शेष है। इस रिपोर्ट में कुल 23 अधिकारियों-कर्मचारियों के नाम खोले गए हैं। इसमें दो भूमि अध्याप्ति अधिकारियों के नाम पिछली जांच रिपोर्ट में भी थे।
कार्रवाई का आधार
भूमि अध्याप्ति अधिकारियों ने पर्यवेक्षण में बरती शिथिलिता
सीडीओ की जांच रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि पूरे प्रकरण में शिथिलता एवं लापरवाही बरतने तथा सम्यक रूप से परीक्षण न करने के लिए आशीष कुमार, विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी, बरेली एवं तत्कालीन विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी बरेली मदन कुमार को दोषी पाया।
तहसीलों को नहीं दी थी अधिसूचना की जानकारी
जांच समिति के एनएचएआई ने 9 अगस्त के पत्र के हवाले से लिखा था कि हाईवे की अधिसूचना जारी होने के बाद तहसील को विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी की ओर से कोई सूचना नहीं दी गई। नतीजा तहसीलों से भू-उपयोग बदला गया। अगर सूचना के अभाव में भू-उपयोग नहीं बदला जाता तो 14.42 करोड़ रुपये की राजस्व क्षति को बचाया जा सकता था। अमर उजाला ब्यूरो