बरेली। एंटीबायोटिक दवाएं घातक नहीं, लेकिन उनके ज्यादा सेवन से जीवाणुओं की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। एंटीबायोटिक के विकल्प के तौर पर कई जीव और कीट-पतंगों से भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) के वैज्ञानिक ने चार ऐसे मालिक्यूल खोजे हैं, जो परीक्षण में सफल रहे। अब वैज्ञानिक क्लिनिकल ट्रायल की तैयारी में जुटे हैं। उद्देश्य जीवाणुओं से जनहानि रोकना है।आईवीआरआई में पशु जैव प्रौद्योगिकी विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. समीर श्रीवास्तव के मुताबिक मालिक्यूल (पेपटाइड्स) को एंटीबायोटिक के विकल्प के तौर पर खोजने की कवायद चार साल पहले शुरू हुई थी। बीएचयू आईआईटी के कंप्यूटर साइंस विभाग में उपलब्ध परम शिवाय सुपर कंप्यूटर की मदद से आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस द्वारा पेपटाइड खोजने की कवायद शुरू हुई। इसके लिए मेंढक और अन्य कीट-पतंगों के प्रोटीन को चुना गया। इन जीवों की त्वचा पर ऐसे मालिक्यूल्स होते हैं जो जीवाणुओं को स्वत: ही नष्ट कर देते हैं। विश्व में लगभग तीन हजार ऐसे पेपटाइड खोजे गए हैं। वैज्ञानिकों का उद्देश्य ऐसे पेपटाइड खोजने का रहा जो कम मात्रा मेें बेहतर परिणाम दें और साइड इफेक्ट न हो।
अब तक 110 मालिक्यूल खोजे गए हैं, इनमें चार हर मानक पर सटीक रहे। 106 मालिक्यूल भी एंटीबायोटिक का विकल्प बन सकते हैं पर उन पर और टेस्ट करने बाकी हैं। टेस्ट के लिए चूहों में घाव बनाकर और उन्हें दागकर बैक्टीरिया (जीवाणु) से संक्रमित किया गया। फिर मालिक्यूल पेपटाइड दिए गए। कई प्रयोग के बाद भी दुष्प्रभाव नहीं दिखा। अब क्लिनिकल ट्रायल की तैयारी है।
क्रीम के तौर पर प्रयोग किए जा सकेंगे पेपटाइड
डॉ. श्रीवास्तव के मुताबिक मालिक्यूल को क्रीम के तौर पर विकसित कर लिया है। क्लिनिकल ट्रायल के लिए एक फार्मा इंडस्ट्री से वार्ता चल रही है। उम्मीद के अनुसार परिणाम मिलने पर क्रीम के तौर इसका प्रयोग किया जा सकेगा। उन्होंने भविष्य में मालिक्यूल्स को इंजेक्शन के तौर पर प्रयोग करने की उम्मीद जताई।
मालीक्यूल्स खोजने की क्यों पड़ रही जरूरतसाल 1927 में ‘पेनिसिलीन’ के तौर पर पहली एंटीबायोटिक खोजी गई थी, फिर करीब सौ साल तक एंटीबायोटिक पर शोध होते रहे। जब नई एंटीबायोटिक विकसित हुई तो जीवाणु भी इसके हमले से खुद को बचाने के लिए प्रतिरोधक क्षमता विकसित करते रहे। लिहाजा, दो एंटीबायोटिक के कॉम्बिनेशन प्रयोग किए जाने लगे। यह भी कारगर रहा। इससे निपटने के लिए भी जीवाणुओं ने खुद को ढाला। इसलिए मालिक्यूल खोजने की जरूरत पड़ी।
30 साल में नहीं खोजी गई नई क्लास की एंटीबायोटिकबताया कि पिछले तीन दशक में कोई नई एंटीबायोटिक नहीं आई है। पुरानी एंटीबायोटिक के प्रति जीवाणुओं ने प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है। वजह रही कि फार्मा इंडस्ट्री ने इसके बजाय एंटी कैंसर, एंटी वायरल, एंटी डायबिटिक, न्यूरो ड्रग आदि पर ज्यादा जोर दिया। वर्तमान में पुरानी एंटीबायोटिक खाई जा रही हैं, जो बेअसर हैं। लिहाजा, डोज बढ़ती जा रही है। इसलिए वैज्ञानिक अब नए तरीके खोज रहे हैं। पिछले दिनों देहरादून में यूनिसेफ की ओर से आयोजित वर्चुअल वर्कशॉप में भी एंटीबायोटिक के बढ़ते प्रयोग और दुष्प्रभाव पर विशेषज्ञों ने चिंता जाहिर की थी।
फोटो : डॉ. समीर श्रीवास्तवजीवाणु जिनमें विकसित हो चुका है रेसिस्टेंस
डॉ. समीर श्रीवास्तव के मुताबिक स्टेफिलोकोक्कस, क्लेब्सिएला, एसिनोबेक्टर, सुडोमोनाश, ईकोलाई, स्ट्रैप्टॉकोक्स वे बैक्टीरिया हैं जिनमें रेसिस्टेंस बन गए हैं। आमतौर पर आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा इन्हीं जीवाणुओं की चपेट में रहता है। इसी विषय पर डॉ. श्रीवास्तव की लैब में वर्तमान में 21 दिन का प्रशिक्षण कार्यक्रम चल रहा है। इसमें देश के विभिन्न प्रदेशों के 25 वैज्ञानिक प्रतिभाग कर रहे हैं, जिन्हें पेपटाइड बनाने की प्रक्रिया के बारे में प्रशिक्षित किया जा रहा है।