वर्ष 2018-19 और 08-09 में भी ऐसा ही था माहौल
मलेरिया विभाग के मुताबिक, वर्ष 2028-19 और 2008-09 में भी मच्छरों का प्रकोप था। वर्ष 2018 में मलेरिया के 37,482 और 2019 में 46,717 मरीज मिले थे। वहीं, वर्ष 2008 में भी 16,148 मरीज थे। तब भी तापमान मच्छरों के पनपने के अनुकूल रहा। ऐसे में मच्छरों के पैरासाइट का तेजी से प्रसार होता है।
जहां सीओ-2 वहां प्रकोप ज्यादा
विशेषज्ञ के मुताबिक, घरों के आसपास पेड़-पौधों पर रहने वाले नर मच्छर नहीं काटते हैं। वे पौधों की पत्तियों का रस चूसते हैं। सिर्फ मादा मच्छर काटती है। वह खून भी चूसती है। इनका ठिकाना घरों के कोने, अंधेरे में बेड के नीचे, स्टोर रूम में होता है। जहां कार्बन डाई ऑक्साइड (सीओ-2) ज्यादा होती है। पेड़ सीओ-2 छोड़ते हैं, इसलिए शाम को झाड़ियों में या पौधों के पास मच्छरों का झुंड रहता है। शरीर के तापमान के मुताबिक भी मच्छर पास आते हैं और दूर भागते हैं। अधिक ठंडे और अधिक गर्म शरीर के पास मच्छर नहीं आते। गर्भवती महिलाओं के पास भी मच्छरों का जमावड़ा होता है।
अब कीटनाशक भी हो रहे बेअसर
माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉ. राहुल गोयल के मुताबिक कीटनाशक में जो केमिकल होता है, उसकी हल्की मात्रा में ही मच्छरों को मारने की क्षमता होती है। कीटनाशक के संपर्क में आए कुछ मच्छर मर जाते हैं तो कुछ भाग जाते हैं। जो बच जाते हैं वे संबंधित कीटनाशक के प्रति एंटीबॉडी विकसित कर लेते हैं। यही वजह है कि अब लिक्विड, क्वॉयल, फाॅगिंग, कार्ड, धुएं का मच्छरों पर असर कम होता जा रहा है। तीन से पांच घंटे तक ही इनका असर रहता है। असर कम होने पर मच्छर सक्रिय हो जाते हैं।