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मौसम बढ़ा रहा मच्छर: बरेली में सर्दी तक चुभता रहेगा डंक, बीमारियां बढ़ने की आशंका; बरतें सावधानी

Sun, 20 Aug 2023 03:32 PM IST
मुकेश कुमार अमर उजाला ब्यूरो, बरेली

सार

विशेषज्ञों के मुताबिक 28 से 35 डिग्री के बीच तापमान होने पर मच्छर तेजी से पनपते हैं। बरेली में पांच साल बाद ऐसा ही मौसम बन रहा है। इसके कारण मच्छरजनित बीमारियां बढ़ने की आशंका है। 
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विश्व मच्छर दिवस - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पांच साल बाद फिर से बरेली का मौसम मच्छरों के पनपने के अनुकूल बना है। इस वजह से यहां मच्छरजनित बीमारियों के बढ़ने की आशंका बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि कड़ाके की ठंड से पहले मच्छरों का खात्मा नहीं होगा। मच्छरों से बचाव और साफ-सफाई ही बीमारी से बचने का तरीका है। बचाव के उपाय न हुए तो मलेरिया और डेंगू के मरीज बढ़ेंगे। हालांकि, नतीजा सभी के सामने है। अगस्त के 18 दिनों में मलेरिया के 564 मरीज सामने आ चुके हैं।

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बरेली कॉलेज में जंतु विज्ञान के विभागाध्यक्ष डॉ. कमल सक्सेना के मुताबिक कड़ाके की ठंड शुरू होने तक मच्छरों का प्रकोप जारी रहेगा। दरअसल मई, जून, जुलाई में हुई तेज बारिश के बाद अगस्त में भी बादलों का जमावड़ा होने से जगह-जगह छिटपुट बारिश जारी है। लिहाजा, लंबे समय तक मच्छरों के लार्वा को पनपने के लिए अनुकूल माहौल मिलता रहेगा। यही वजह रही कि इस साल अप्रैल में मलेरिया के 12 मरीज रहे जबकि मई में तादाद 36, जून में 183 और जुलाई में 270 तक जा पहुंची। अब 1100 के पास है। बारिश की वजह से मौसम में नमी भरपूर है। जगह-जगह जलभराव है।

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डॉ. सक्सेना के मुताबिक तापमान भी मच्छरों की वंशवृद्धि की वजह बनता है। अधिकतम तापमान 25 डिग्री से कम और 35 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा होने पर लार्वा पनपने की क्षमता प्रभावित होती है। 20 डिग्री से कम और 40 डिग्री से ज्यादा पहुंचने पर मच्छरों का प्रकोप थमता है। 28 से 35 डिग्री के बीच तापमान में मच्छर अधिक पनपते हैं। वर्तमान में यही तापमान दर्ज हो रहा है। यह मच्छरों के पनपने का अनुकूल माहौल है।

वर्ष 2018-19 और 08-09 में भी ऐसा ही था माहौल

मलेरिया विभाग के मुताबिक, वर्ष 2028-19 और 2008-09 में भी मच्छरों का प्रकोप था। वर्ष 2018 में मलेरिया के 37,482 और 2019 में 46,717 मरीज मिले थे। वहीं, वर्ष 2008 में भी 16,148 मरीज थे। तब भी तापमान मच्छरों के पनपने के अनुकूल रहा। ऐसे में मच्छरों के पैरासाइट का तेजी से प्रसार होता है।

जहां सीओ-2 वहां प्रकोप ज्यादा

विशेषज्ञ के मुताबिक, घरों के आसपास पेड़-पौधों पर रहने वाले नर मच्छर नहीं काटते हैं। वे पौधों की पत्तियों का रस चूसते हैं। सिर्फ मादा मच्छर काटती है। वह खून भी चूसती है। इनका ठिकाना घरों के कोने, अंधेरे में बेड के नीचे, स्टोर रूम में होता है। जहां कार्बन डाई ऑक्साइड (सीओ-2) ज्यादा होती है। पेड़ सीओ-2 छोड़ते हैं, इसलिए शाम को झाड़ियों में या पौधों के पास मच्छरों का झुंड रहता है। शरीर के तापमान के मुताबिक भी मच्छर पास आते हैं और दूर भागते हैं। अधिक ठंडे और अधिक गर्म शरीर के पास मच्छर नहीं आते। गर्भवती महिलाओं के पास भी मच्छरों का जमावड़ा होता है।
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अब कीटनाशक भी हो रहे बेअसर

माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉ. राहुल गोयल के मुताबिक कीटनाशक में जो केमिकल होता है, उसकी हल्की मात्रा में ही मच्छरों को मारने की क्षमता होती है। कीटनाशक के संपर्क में आए कुछ मच्छर मर जाते हैं तो कुछ भाग जाते हैं। जो बच जाते हैं वे संबंधित कीटनाशक के प्रति एंटीबॉडी विकसित कर लेते हैं। यही वजह है कि अब लिक्विड, क्वॉयल, फाॅगिंग, कार्ड, धुएं का मच्छरों पर असर कम होता जा रहा है। तीन से पांच घंटे तक ही इनका असर रहता है। असर कम होने पर मच्छर सक्रिय हो जाते हैं।
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