धान के खेत में प्रदर्शन करते किसान।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
किसान बोले- फसल की लागत का मूल्यांकन किए बिना कैसे तय कर ली कीमत
बरेली। कृषि विधेयक के विरोध के बीच केंद्र सरकार ने रबी की छह फसलों गेहूं, चना, जौ, मसूर, सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित कर दिया है। इसमें वृद्धि भी की है, लेकिन किसान इससे संतुष्ट नहीं हैं। वे इसे लागत के अनुपात में बहुत कम बता रहे हैं। कहते हैं कि कृषि ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र है, जहां उत्पाद का मूल्य बिना लागत का मूल्यांकन किए वे लोग तय करते हैं जो उत्पादक ही नहीं हैं। आनन-फानन में समर्थन मूल्य घोषित करने के पीछे शासन की मंशा किसानों को राहत देने से ज्यादा कृषि विधेयक के विरोध को कम करने की रही है। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि कृषि विधेयक में एमएसपी पर खरीद की गारंटी भी सरकार को देनी चाहिए। अलबत्ता कुछ किसानों का कहना है कि कृषि विधेयक ने किसानों को आजादी दी है। विधेयक का विरोध करने से पहले उसे समझना जरूरी है।
सरकार ने फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि की है। यह अच्छी बात है, लेकिन सरकार को फसलों की लागत का अच्छे से आकलन करना चाहिए था, क्योंकि लागत में काफी इजाफा हो रहा है। इसके आधार पर ही वृद्धि होती तो और बेहतर रहता। - मुकर्रम अली खां, शाहगढ़।
कृषि विधेयक का विरोध करना गलत है। इसका फायदा किसानों को ही मिलना है। हमें किसी भी मंडी में फसल बेचने की आजादी मिलेगी। हम कंपनियों से अनुबंध करके फसल तैयार कर पाएंगे। बिचौलियों से आजादी पाएंगे। यह विधेयक पारंपरिक खेती से निकालकर व्यापारिक खेती की ओर ले जाएगा। इससे किसानों की आर्थिक दशा में सुधार होगा। - सरदार जैल सिंह, रिछौली।
सरकार ने रबी की छह फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की है, लेकिन उर्वरक, डीजल, बिजली के दाम इसके अनुपात में कई गुना ज्यादा बढ़े हैं। बस यही कह सकते हैं कि सरकार ने कुछ तो दाम बढ़ाए हैं लेकिन यह कहना गलत है कि इससे किसानों को कोई फायदा होगा। - रवि ढाका, डंडिया।
बात सिर्फ इतनी है कि एमएसएपी में कुछ तो बढ़ोतरी हुई है, लेकिन सरकारी केंद्रों पर खरीद सत्र में अगर गेहूं न बेचें तो मंडियों में एमएसपी नहीं मिलता है और सरकारी केंद्रों पर खरीद की अवधि निश्चित होती है। इधर, डीजल और फसल की बुवाई से लेकर गहाई तक का पैसा बढ़ा है। इसके एवज में यह बढ़ोतरी बहुत कम है। - विजेंद्र सिंह, चंगासी