बरेली। सरकारी अस्पतालों में संस्थागत प्रसव बढ़ाने की उम्मीदों पर जिम्मेदार ही पलीता लगा रहे हैं। चल रहे वित्तीय वर्ष में लक्ष्य के सापेक्ष अब तक महज 37 फीसदी प्रसव सरकारी अस्पताल में हुए हैं। ऐसे में आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका संदिग्ध मानी जा रही है। इसको लेकर जांच के निर्देश हैं।
आशाओं की मुस्तैदी पर प्रश्नचिह्न की वजह बीते दिनों शहर के मिनी बाईपास स्थित नोवा अस्पताल में नियमों को धता बताकर हुई बैठक बताई जा रही है। स्वास्थ्य विभाग की टीम ने यहां 15 आशा कार्यकर्ताओं को पकड़ा था। इन सभी को नोटिस जारी किया गया और एमओआइसी से भी स्पष्टीकरण मांगा गया। इस बीच एक और निजी अस्पताल में नौ आशा कार्यकर्ता बैठक करती पकड़ी गई। जिन्हें नोटिस थमाई गई। पर अभी तक किसी का कोई जवाब नहीं मिला है।
बताते हैं कि आशा कार्यकर्ताओं को निजी अस्पताल कमीशन का लालच देते हैं, ताकि सरकारी अस्पताल में जांच के लिए पहुंच रहीं गर्भवती को जब प्रसव पीड़ा हो तो उन्हें निजी अस्पताल लाया जा सके। नतीजा, गर्भधारण के बाद नौ माह तक नियमित जांच सरकारी अस्पताल में होती हैं पर जब प्रसव की बारी आती है तो ज्यादातर गर्भवती निजी अस्पताल पहुंचती हैं।
नोटिस-नोटिस खेल रहे जिम्मेदार
सरकारी अस्पताल में प्रसव घटने की वजह स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार भी हैं। बीते दिनों जिस नोवा अस्पताल प्रबंधन ने आशा कार्यकर्ताओं की बैठक बुलाई, उसे सिर्फ नोटिस देकर खानापूर्ति कर ली गई। अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। प्रकरण पर सीएमओ डाॅ. विश्राम सिंह का कहना है कि निजी अस्पताल को फिर नोटिस दी जाएगी। जवाब न मिलने पर कार्रवाई होगी। ब्यूरो