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नई शिक्षा नीति से हिंदी होगी और सशक्त

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डॉ. एससी त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
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बरेली। हिंदी हमारे देश की आत्मा है और सबसे ज्यादा बोली जानी वाली बहुत मधुर और समृद्ध होने के कारण इसका महत्व लगातार बढ़ रहा है। यह दुनिया की चौथी सबसे बड़ी भाषा होने के साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी विशेष पहचान रखती है। हिंदी को बढ़ावा देने वालों का मानना है कि आने वाला समय हिंदी का ही होगा। नई शिक्षा नीति में राजभाषा का ढांचा मजबूत करने की कोशिश चल रही है।

हिंदी के बढ़ते स्वरूप और कर्मकारों की भाषा को देेखते हुए गूगल ने भी दी अहमियत

भाषा गई तो मानों संस्कृति गई। भाषा केवल भाषा नहीं है, बल्कि वह हमारे क्रमिक विकास और विचार शक्ति को भी प्रदर्शित करती है। 13वीं शताब्दी में महान सूरी शायर हजरत अमीर खुसरो ने 22 बोलियों का अध्ययन करते हुए कहा था भविष्य में भारत की भाषा हिंदी ही होगी। 14 सितंबर 1946 को ही संविधान सभा की कार्यवाही का अभिलेख किस भाषा में रखा जाएगा, इसे लेकर विवाद पैदा हो गया था। लेकिन बाद में हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी, ऐसा संविधान में वर्णीत हो गया। तब से व्यवहारिक स्थिति जो भी हो लेकिन संख्या और संपर्क तथा समृद्घता की दृष्टि से हिंदी को एक वैधानिक दर्जा प्राप्त हो गया है। वर्ष 1953 से ही हम 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाते आ रहे हैँ। हिंदी भाषा का विस्तार क्षेत्र और इससे जुड़े कर्मशील समाज को देखते हुए ही गूगल जैसे सबसे बड़े सर्च इंजन को समानांतर हिंदी में समृद्ध होने के लिए मजबूर होना पड़ा है। बहुत सारी विदेशी कंपनियां हिंदी की उपयोगिता व ताकत को आंक कर इसको बढ़ावा दे रही हैं। 1960 से केंद्रीय कर्मचारियों को हिंदी सीखना अनिवार्य है और प्रत्येक राजकीय संस्थान में राजकीय पखवाड़ा मनाकर हम हिंदी को लगातार बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। हिंदी फिल्मों की बढ़ती लोकप्रियता और धारावाहिकों से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस भाषा की बहुत बड़े वर्ग में कितनी मजबूत पकड़ है। हिंदी भाषा का साहित्य जिस तरह समृद्ध होने के साथ - साथ व्याकरण और अनुशासन से बंधा है, उसका दुनिया की किसी दूसरी भाषा से मुकाबला नहीं किया जा सकता। नई शिक्षा नीति 2020 भी मातृभाषा की पक्षधर है। अगर हम नई शिक्षा नीति में हिंदी का मजबूत ढांचा तैयार करने में सफल हुए तो हिंदी दुनिया की किसी भी क्षेत्रीय या अंतर्राष्ट्रीय भाषा से कहीं अधिक समृद्ध होकर निकलेगी। इन प्रयासों से एक जगत गुरू भारत का निर्माण भी किया जा सकता है। -डॉ. एसी त्रिपाठी, एसोसिएट प्रोफेसर, बरेली कॉलेज
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