ब्रिटिश काल में प्रभावित रहा काम
जरदोजी फारसी शब्द है। जो ‘जरी’ और ‘दोजी’ से मिलकर बना है। ‘जरी’ मतलब सोना और ‘दोजी’ मतलब कढ़ाई यानी ‘सोने की कढ़ाई’ का काम। बरेली में जरी कारोबार मुगल काल से हो रहा है। ब्रिटिश शासन काल में औद्योगीकरण ने जरदोजी को ऐसी टक्कर दी कि यह कला औंधे मुंह आ गिरी। आजाद भारत में इसे एक बार फिर उठने का मौका मिला। जो अभी जारी है।
दो दशक में काफी प्रभावित हुआ कारोबार
कारोबारियों के मुताबिक पहले साड़ी पर जरी कारीगरी खूब होती थी। फतेहगंज पश्चिमी में सर्वाधिक जरी साड़ियां बनती थीं। कीमत 300 रुपये होती थी। अब साड़ियों की मांग कम हुई है। महिलाएं सूट या गाउन पहनती हैं। वैवाहिक आयोजन में लहंगा का चलन है। लिहाजा, कारोबार खासा प्रभावित हुआ। करीब 50 फीसदी तक प्रभावित होने की आशंका है।
पशमीना शॉल पर भी अब होती है कढ़ाई
शाकिर के मुताबिक बरेली में ही पशमीना शॉल पर जरी की कढ़ाई होती है। एक शॉल की कीमत 30 से 40 हजार रुपये होती है। इन पर कढ़ाई के चार प्रकार हैं। पहला दरबार। इस पर हाथी, घोड़े और राजा होते हैं। दूसरा मधुवन। इसमें तितली, हिरन, पेड़-पौधे होते हैं। तीसरा शिकार। इसमें हिरन पर घोड़े पर तीन चलाना। चौथा बरात। इसमें फेरे, हाथी, घोड़े, बाजा आदि की कढ़ाई करते हैं।
पहले सोने-चांदी के तारों से होती थी कारीगरी
जरी का काम पहले सोने, चांदी की तारों, छोटे मोती, नगीनों, रत्नों से होता था। राजा-महाराजाओं के कपड़े जरदोजी के होते थे। अब सिल्क, साटिन, वेलवेट फैब्रिक पर मेटल एंब्रॉइडरी होती है। इसके लिए जरी, गोल्डन थ्रेड, मोती, सुनहरे सितारे, कटदाना, सलमा, सितारा, दबका आदि प्रयोग होता है। लहंगे, दुपट्टे, सूट, बोतल के कवर, बैग आदि पर जरदोजी का काम होता है।
यूं होता है जरी का काम
जिस कपड़े पर जरदोजी होनी है, उसे कढ़ाई के लिए लकड़ी के एक फ्रेम में फिट करते हैं। इसे अड्डा कहा जाता है। कढ़ाई हुक जैसी नोक वाले सुआ या अरी से होती है। एक-एक दाना, मोती, कटदाना, सलमा, सितारा, दबका, बड़े ध्यान से लगाने पड़ते हैं। इतना बारीक काम है कि इस काम में लगे कारीगरों को समय से पहले आंखों पर चश्मा लग जाता है।