बरेली/बिशारतगंज। फेल्सीपेरम मलेरिया से एक युवक की मौत से स्वास्थ्य विभाग के निरोधात्मक अभियान की पोल खुल गई। इसने ंचार साल फिर इस रोग के जानलेवा होने का भी संकेत दे दिया। शुक्रवार को संक्रामक रोगों के रीजनल सर्विलांस अधिकारी और जिला मलेरिया विभाग की टीमों बिशारतगंज के नूरपुर समेत 42 गांवों में बुखार पीड़ितों की जांच की। इसमें फेल्सीपेरम (पीएफ) के 17 केस और मिले।
नूरपुर बुजुर्ग गांव में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने मृतक छोटेलाल के घर पहुंचकर उनके परिजनों से पूछताछ की। गांव का निरीक्षण कर उन्होंने मच्छरों के पनपने के संभावित स्थान देखे। लोगों से उनकी तबीयत के बारे में पूछा। जिन लोगों को बुखार था, उनकी किट के जरिए जांच की। गांव में सात बुखार पीड़ितों में फेल्सीपेरम पॉजिटिव मिलने पर उन्हें दवाएं और परामर्श दिया गया। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मझगवां के प्रभारी चिकित्साधिकारी के नेतृत्व में टीम ने ब्लॉक के 42 गांवों में जांच की। इस दौरान 17 मरीजों में फेेल्सीपेरम और सात में वाइवैक्स की पुष्टि हुई।
नए केस मिलने के बाद गांव में 34 पीड़ित
डॉ. वैभव राठौर ने बताया जांच में नए केस मिलने के बाद ब्लॉक में अब 34 पीएफ केस हो गए हैं। उन्होंने बताया कि एक कर्मचारी को नियमित रूप से पॉजिटिव केसों की समीक्षा की जिम्मेदारी दी गई है। एक युवक की मौत के बाद अब स्थानीय प्रशासन भी सतर्क हो गया है। नगर निकाय के अधिशासी अधिकारी शिवपूजन सिंह ने पंचायत कर्मियों को कीटनाशक दवा के छिड़काव और फॉगिंग कराने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने किसी तरह की समस्या आने पर लोगों से तत्काल सूचना देने की अपील की है।
2018 में महामारी बन गया था मलेरिया
साल 2018 में बरेली में मलेरिया महामारी बन गया था। हालात यह थे कि शासन स्तर से केस को नियंत्रित करने के लिए मुहिम चलाई गई थी। अकेले मझगवां में ही करीब दस हजार मलेरिया के केस मिले थे। लिहाजा, यह ब्लॉक अतिसंवेदनशील इलाकों की सूची में दर्ज कर लिया गया था। जानकारी के मुताबिक करीब 34 हजार केस जिले भर में सामने आए थे। इसमें करीब 12 हजार से केस फेल्सीपेरम के थे।