आईसीएसई 10 वीं का टॉपर याहया का मन पढ़ाई से ज्यादा क्रिकेट खेलने और टेलिविजन देखने में लगता है। इसके लिए मां उसको रोजाना बार-बार डांटती थीं कि पेपर होने वाले हैं, आखिर कब पढ़ोगे लेकिन मनमौजी याहया का मन पढ़ाई में कम ही लगता। उसने बताया- मां जब डांटती थी, तो पापा प्यार से समझा देते- तुम्हारा शौक है तो खूब खेलो। टीवी भी देखो लेकिन इतना जान लो कि अगर पढ़ोगे तो अपने लिए। यही पढ़ाई भविष्य में तुम्हारे ही काम आएगी। पापा की यही बात उसके लिए सीख बन गई। उनकी नसीहत को अपने मन में ऐसा समाया कि कक्षा सात के बाद हमेशा अपनी क्लास में अव्वल आकर दिखाया। याहया ने बताया कि पढ़ाई यह सोचकर की कि मैं जितना पढूंगा, अपने भले के लिए। एग्जाम के दिनों में सिर्फ पांच घंटे पढ़ाई की लेकिन पूरे मन से पढ़ा। शहर की न्यू आजादपुरम कालोनी में रहने वाले मोहम्मद याहया शायर शम्स बदायूंनी यानी डॉ. एएम शम्स के बेटे हैं। बेटे की सफलता से बेहद खुश डॉ. शम्स ने बताया- याहया से इसके टीचर्स कहते थे, हम तो तुम्हें तब होशियार मानें, जब तुम्हारा फोटो अखबार में छपे। इसने उनकी बात पूरी कर दी। भविष्य में डॉक्टर बनने का सपना संजोए याहया की दो बहनें एमबीबीएस कर रही हैं। मां यास्मीन गृहणी हैं। याहया को हिंदी में महज 96 और अंग्रेजी में 94 अंक ही मिलने का अफसोस है। उसे इन दोनों विषयों में 100-100 अंक की उम्मीद थी।