उत्तर प्रदेश जीतने के लिए भाजपा ने कई दांव चले हैं जिनमें से एक है तीन तलाक का मसला। सरकार कह रही है कि चुनाव बाद कानून बना कर तीन तलाक की प्रथा ही खत्म कर देंगे। जाहिर तौर पर यह उन मुस्लिम नेताओं को सीधी चुनौती है जो इसे शरई मामलों में दखल कह कर विरोध कर रहे हैं। आम मुसलमान महिलाओं की राय इस पर मिली जुली है। उनका भी मानना है कि यह मुस्लिम समाज को अलग करने का एक सियासी दांव है और चुनाव के वक्त इसे उछालने का तो यही मकसद मुसलमानों के प्रति ठीक भाव न रखने वालों को अपने पक्ष में मोड़ना है। तलाक देकर किसी की जिंदगी बर्बाद करना गलत है लेकिन उससे भी बड़े मसले हैं। गुरबत और जहालत वो मर्ज हैं जिनके इलाज की जरूरत है। इल्म होगा तो तो लोग किसी मौलाना के पास जाकर तलाक का सर्टिफिकेट लेने की बजाए तलाक कहना ही छोड़ देंगे। नरेंद्र मोदी सरकार मुस्लिम महिलाओं से हमदर्दी रखती है तो उन्हें नौकरियां दे, आरक्षण दे, शैक्षिक और राजनीतिक रूप से मजबूत बनाए।
सुभाष नगर की शबीना बी का कहना है कि तीन तलाक को चुनावी मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। भाजपा महिलाओं की शिक्षा और आरक्षण को मुद्दा बनाए। उनकी बेहतरी के लिए योजनाएं लाए। देवरनिया निवासी वूमेन वाइस की अध्यक्ष शब्बो खान का कहना है कि भाजपा जब मुसलमानों को ही नहीं बर्दाश्त नहीं पाती तो तीन तलाक पर मुस्लिम महिलाओं से हमदर्दी कैसी। जो मुस्लिम महिलाएं उनकी पार्टी में थीं उन्हें ही नहीं पचा पाई। घेर जाफर खां की यासमीन खान का कहना है कि तीन तलाक का मुद्दा सीधे-सीधे शरीयत में दखलअंदाजी है। अगर भाजपा को मुस्लिमों से हमदर्दी है तो पूरे प्रदेश में एक भी टिकट मुस्लिम को क्यों नहीं दिया। आजमनगर की आतिफा ने कहा कि अगर भाजपा एक ऐसा काम करके दिखाए जिससे महिलाएं समाज में मजबूती से खड़ी हो सके। ये सब मुस्लिमों को डिस्टर्ब करने का शगूफा है। बानखाना की अफरोज बानो कहती हैं कि भाजपा हमदर्दी रखती हैं तो उन महिलाओं के लिए कुछ अच्छा कर दे जो बेसहारा विधवा है।
चुनावी माहौल में इस तरह की बात कहना सिर्फ चुनावी फायदा उठाना है। चुनाव के बाद सरकार के सारे दावे हवा हवाई साबित होंगे। मुस्लिम महिलाओं पर इस तरह के एलान का कोई असर नहीं पड़ने वाला। सिर्फ कठोर कानून बना देने से अगर जुर्म कम हो जाते तो इतने अपराध नहीं होते। अगर मुस्लिम महिलाओं की सरकार को इतनी फिक्र है तो उनको शिक्षित और रोजगार उपलब्ध कराने की योजना बनाओ। अगर शिक्षित होंगी तभी तो तलाक जैसे मसलों पर हक से अपनी बात कह सकेंगी।
-चमन जहां, प्रधानाचार्य इस्लामिया गर्ल्स इंटर कॉलेज
मुस्लिम महिलाओं का वोट लेने के लिए और भी मुद्दे उठाए जा सकते थे, मुझे तीन तलाक चुनावी मुद्दा नहीं लगता। हमारे देश में महिलाएं आर्थिक और सामाजिक रूप से पूरी तरह मर्दों पर डिपेंड हैं। लोग कहते हैं कि कुरान के मुताबिक छह महीने में तलाक हो। एक बार में तीन तलाक सुनकर जिस औरत की आत्मा मरती है, वह छह महीने में कई बार वैसा ही दर्द झेलने को मजबूर हो जाएगी। तलाक अपनी पसंद और हक की लड़ाई है, इसे भारतीय कानून से ही लड़ा जाना चाहिए। - शबाना, वकील, किला हुसैन बाग
कानून बनाकर तीन तलाक की प्रक्रिया को खत्म करना बहुत जरूरी है। विडंबना है कि ज्यादातर मुस्लिम महिलाएं पीड़ित होने के बाद भी विरोध नहीं कर रहीं। मैं अपने साथ हुई इस नाइंसाफी की लड़ाई लड़ रही हूं। तीन तलाक का एक विकल्प कुरान में बताए तलाक के तरीके का पालन करना हो सकता है। पर उसमें महिला को गुजारा भत्ता नहीं मिलता, इसलिए भारतीय कानूनी प्रक्रिया के तहत ही पत्नी या पति को तलाक मांगने की व्यवस्था होनी चाहिए। बीजेपी ने चुनाव के समय नियम बनाने की बात कही है, इसका राजनीतिक फायदा उठाए जाने की संभावना तो है पर इसका सीधा फायदा मुस्लिम महिलाओं को ही होगा। एक पक्ष यह भी है कि ज्यादातर मुस्लिम महिलाओं को परिवार वाले वोट डालने ही नहीं ले जाते। तो इस फैसले को वोट के रूप में भुनाना इतना संभव नहीं।
- निदा खान
शरियत के हिसाब से बने तलाक के मौजूदा कानून में बदलाव की जरूरत तो है। तलाक का हालिया तरीका ढुलमुल है, जिस कारण मुस्लिम औरतों को न्याय नहीं मिल पाता। इस नियम में सख्ती की जानी चाहिए। पर जिस तरीके से मोदी जी कॉमन सिविल कोड लाकर बदलाव करना चाहते हैं, ये बदलाव उस तरीके से नहीं होना चाहिए। पार्टी को इसे राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। यह धर्म विशेष की स्वतंत्रता से जुड़ा मसला भी है इसलिए इस पर संवेदनशील होने की जरूरत है।
- रफत जहां, वकील सिविल कोट