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अफसर नहीं बता पाए किसने चलाई गोली

Sat, 22 Jul 2017 01:56 AM IST
बरेली
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मजिस्ट्रेटी जांच...यह शब्द प्रशासन का हथियार है जो हर बड़े बवाल या घटना के बाद भीड़ को बहलाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह जांचें शुरू तो होती हैं लेकिन खत्म होने का वक्त निर्धारित ही नहीं होता। कुछ सालों तक लोग याद रखते हैं और फिर भूल जाते हैं। इसी का उदाहरण है प्रदेश भर में बरेली को बदनाम करने वाले 22 जुलाई 2012 को बरेली में हुए दंगे की जांच। सपा सरकार में कांवड़ के रास्ते को लेकर विवाद होने के बाद शहर में दंगा भड़क जाने पर पुलिस ने गोली चलाई जिससे युवक इमरान की मौत हो गई थी। पथराव के दौरान एसपी सिटी समेत कई कई लोग जख्मी हो गए थे। डीएम ने इस मामले की मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए थे। पांच साल बाद भी इस मामले की मजिस्ट्रेटी जांच पूरी नहीं हो पाई है। पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों से कोई भी यह बताने को तैयार नहीं है कि गोली किसके आदेश पर चली थी। 
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विवाद की शुरुआत कोहड़ापीर इलाके में विभूतिनाथ मंदिर में जलाभिषेक को जा रहा कांवड़ियों के जत्थे के बैंडबाजे के साथ चलने के विरोध से हुई। पूरे शहर का माहौल बिगड़ जाने पर पथराव के साथ गोलीबारी भी हुई थी। दंगाईयों ने कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया था। पुलिस ने इस दौरान गोली चला दी थी और इमरान की मौत हो गई थी। 
अफसरों ने हाथ खड़े कर दिए
इस मजिस्ट्रेटी जांच में तत्कालीन कमिश्नर के राममोहन राव के भी बयान दर्ज हुए। उन्होंने कह दिया कि कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होती है। इसलिए मेरा गोली चलाने के आदेश देने का मतलब ही नहीं बनता है। तत्कालीन एडीएम सिटी राजेश कुमार राय ने कहा कि गोली मैंने नहीं चलवाई। घटना के समय आला अधिकारी भी मौजूद थे। एसएसपी को कई रिमांडर भेजकर जांच अधिकारी यह पूछ चुके हैं कि गोली किसके आदेश पर चली बताएं। उनके यहां से कोई जवाब नहीं मिल रहा है। 
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 मजिस्ट्रेट के चार सवालों का जवाब नहीं मिल रहा
मजिस्ट्रेटी जांच में एडीएम मनोज कुमार ने एसएसपी से चार सवाल पूछे हैं। एक फायरिंग का आदेश किसने दिया। दूसरा कितने राउंड फायर हुए। तीन-किन असलहों से फायरिंग हुई। फायरिंग में कितने लोग मारे गए। उन्होंने बारादरी थाने के तत्कालीन इंस्पेक्टर और पुलिस कर्मियों के बयान दर्ज कर लिए हैं। कोई पुलिस वाला गोली चलाने की बात स्वीकार नहीं कर रहा है। इनमें से ज्यादातर का कहना है कि बंदूक या राइफल लेकर घटनास्थल नहीं गया था। हमारे पास डंडे थे।
15 मजिस्ट्रेटी जांच लंबित
पिछले पांच साल में 67 मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश हुए। इनमें से जेल में मरने वाले बंदियों की मौत के मामलों की ज्यादातर जांचों को पूरा करके रिपोर्ट आला अफसरों को सौंप दीं। इनमें से 15 मजिस्ट्रेटी जांच अभी तक लंबित चल रही हैं। 

यह मजिस्ट्रेटी जांच अभी लंबित हैं
केंद्रीय कारागार से सिद्धदोष बंदी खेमपाल निवासी जलालपुर, थाना बिसौली, जनपद बदायूं की मौत के मामले की जांच 11 जुलाई 2017 से लंबित है। इस जेल के सिद्धदोष बंदी टीकाराम, नत्थूलाल,नन्हें, नत्थू,राजकीय महिला शरणालय की संवासिनी गुलशन और एक अज्ञात संवासिनी की मजिस्ट्रेटी जांच अभी तक पूरी नहीं हो पाई है। बहेड़ी में पटाखा फैक्ट्री में विस्फोट होने, मोहर्रम के मौके पर नवाबगंज और बहेड़ी इलाके में हुए विवादों की मजिस्ट्रेटी जांच अभी तक पूरी नहीं हो पाई है। 

न्यायिक जांच की सिफारिश
-जोगीनवादा चौकी इंचार्ज के पकड़कर लाने के बाद चौकी से गायब होने वाले सोनू वाल्मीकि और पुलिस हिरासत में पिटाई किए जाने पर मरने वाले अनुज भटनागर की जांच एडीएम ने पूरी करके न्यायिक जांच की सिफारिश कर दी है।  
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