मिलावटखोर का मिजाज तो हमेशा से सेहत से खिलवाड़ का ही रहता है। मौका ज्यादा फायदे का हो तो इनकी हरकतें ज्यादा खतरनाक हो जाती हैं। होली नजदीक है। त्योहार है तो भारी मात्रा में नमकीन की खपत भी खूब होती है। ऐसे में मुनाफाखोरी के चक्कर में मिलावटखोर फिर सक्रिया हो गए हैं। चावल से नकली बेसन बनाने के लिए अखाद्य सिंथेटिक रंग इस्तेमाल हो रहा है, फिर इसी बेसन से नमकीन बनाई जा रही है। इसे काफी मात्रा में बाजार में खपा भी दिया गया है। इसके बावजूद एफएसडीए अफसर शिथिल बने हुए हैं।
दरअसल, बेसन महंगा हो गया तो लोगों ने इसकी काट निकाली और मटर दाल से बना बेसन इस्तेमाल होने लगा। कई ब्रांडेड कंपनियों ने पैकिंग पर मटर बेसन लिखना भी शुरू कर दिया है, लेकिन जिले में चावल से नकली बेसन बनाया जा रहा है। इसके लिए नमकीन उत्पादक चावल आटा में अखाद्य सिंथेटिक रंग मिलाकर माल तैयार कर रहे हैं। इसी से नमकीन बनाई जा रही है। गली-मोहल्लों में कुटीर उद्योग की तरह अधोमानक नमकीन बनाई जा रही है। इसे होली पर ही खपाया जाना है।
50 टन नमकीन खपाने की तैयारी
कारोबारियों के अनुसार, इस बार नमकीन की मांग ज्यादा है। उपभोक्ता चमकदार और कुरकुरी नमकीन ज्यादा पसंद करते हैं। कुरकुरापन चावल आटा से ही संभव है। चावल आटा से बनी नमकीन पीली करने में घटिया अखाद्य सिंथेटिक रंग इस्तेमाल किया जाता है। सस्ता और घटिया खाद्य तेल से तैयार करीब 50 टन से ज्यादा निम्न स्तरीय नमकीन त्योहार पर खपाई जाएगी। कारोबारी धर्मेंद्र देवनानी और पंकज माहेश्वरी बताते हैं कि नमकीन में घटिया बेसन, रंग और तेल इस्तेमाल करना अनुचित है। यह स्वास्थ्य पर सीधा हमला करते हैं।
एक हजार जगहों पर बनती है
जिले में एक हजार से ज्यादा स्थानों पर घटिया नमकीन बनाने के छोटे-बड़े कारखाने हैं। घरों में भी इसका काम होता है, लेकिन इनके पास कोई लाइसेंस तक नहीं है। इस अवैध धंधे से खाद्य सुरक्षा व औषधि प्रशासन अनभिज्ञ नहीं है, क्योंकि इन सभी कारखानों से नियमित वसूली होती है। गिने-चुने लाइसेंस हैं। उन्हें भी महीना देना अनिवार्य है।
पांच करोड़ का कारोबार
होली पर करीब पांच करोड़ रुपये से ज्यादा नमकीन, बिस्कुट, पापड़, कचरी आदि का कारोबार होने की उम्मीद है। इसमें ब्रांडेड और गैर ब्रांडेड आइटम शामिल हैं।
जाने-अनजाने सस्ती नमकीन और अन्य खाद्य सामग्री खरीदना सही नहीं है। निर्माताओं पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। अखाद्य रंग से बने आइटम तो बेहद खतरनाक हैं।
- डॉ. वागीश वैश्य, फिजीशियन, जिला अस्पताल