The four accused in the murder case to life imprisonment installment
- फोटो : बरेली, अमर उजाला
सुभाषनगर के मोहल्ला नेकपुर बाग में दो साल पहले हुए मासूम अंशिका हत्याकांड में दोषी ठहराए गए एक ही दंपति और उसके बहू बेटे को कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। चारों पर पांच-पांच हजार का अर्थदंड भी लगाया है। सजा सुनते ही सास और बहू दहाड़े मारकर रोने लगीं। कोर्ट परिसर में उनके पैरोकारों की आंखें भी नम हो गईं।
यह बहुचर्चित मामला 11 सितंबर 2014 का है। चार साल की अंशिका के अचानक गुम होेने से परिवार वाले परेशान हो गए थे। वे इधर-उधर ढूंढते रहे लेकिन कहीं न मिलने पर गुमशुदगी करा दी गई। चाचा सर्वेश कुमार और परिवार वाले 12 सितंबर को भी तलाश जारी रखते हुए पड़ोसियों से पूछताछ करते रहे। पड़ोसी सतेंद्र शर्मा के घर गटर में नया सीमेंट लगा देखने पर इसकी जानकारी ली तो कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका। इस पर सर्वेश का शक गहरा गया। उसने सतेंद्र के बेटे दीपक उर्फ दीपू से इस बारे में बताने को कहा तो वह घबरा कर भागने लगा। सर्वेश ने मोहल्ले के ही नागेंद्र उर्फ टीटू, गोपाल आदि के साथ गटर खुलवा दिया। वहां प्लास्टिक के कट्टे में अंशिका की लाश पड़ी थी। यह देख अंशिका के घर वाले दंग रह गए। इसके बाद सर्वेश ने सतेंद्र शर्मा उनकी पत्नी अरुणा शर्मा, बेटे दीपक उर्फ दीपू और बहू गौरी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 363, 302, 201 और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जन जाति अधिनियम की धारा 3(2) चतुर्थ के तहत मामला दर्ज करा दिया। विशेष न्यायाधीश एसएस/एसटी एक्ट राघवेंद्र ने बृहस्पतिवार को चारों को दोषी करार दिया था। शुक्रवार को सजा सुनाई गई। हालांकि कोर्ट ने बालिका को अपहृत करने के आरोप से चारों को दोष मुक्त कर दिया। शुक्रवार को इस मामले में फैसला सुनने के लिए कोर्ट परिसर काफी भीड़ लगी रही। आरोपियों के परिवार के लोग और रिश्तेदार सुबह से ही कोर्ट परिसर में पहुंच गए थे।
बेटिया की फोटो देख रो पड़े घरवाले
अंशिका के घरवाले इसे इंसाफ की जीत बता रहे हैं मगर उसका फोटो देख वे रो पड़े। पिता सुशील कुमार ने बताया कि वह एक निजी अस्पताल में कंपाउडरी करते थे। अंशिका की हत्या होने के बाद उन्होंने काम छोड़ दिया और उसके हत्यारोपियों को सजा दिलाने में लग गए। कामकाज सब छोड़कर पूरा दम पैरवी में लगा दिया। इसी का असर रहा कि उनकी बात सुनी गई और उन्हें इंसाफ मिला। मुकदमे के वादी अंशिका के चाचा अधिवक्ता सर्वेश कुमार का कहना है कि हत्याकांड के पूरे दो साल तीन महीने हो गए। इस बीच उन्होंने एक भी दिन चैन की सांस नहीं ली। भतीजी के हत्यारोपियों को सजा दिलाने के लिए हरपल प्रयास किया। उनकी जमानत खारिज कराने को हाईकोर्ट तक गए, जहां उनकी सुनी गई और अदालत से इंसाफ मिला। छोटा भाई उदय और मां मानसी अपने पंद्रह दिन के नवजात को गोद में लेकर कहती है कि अंशिका को खोने का गम तो है, लेकिन उसके हत्यारों को सजा हुई इससे दिल को कुछ तसल्ली मिली है। बुजुर्ग दादा हरिराम अंशिका को याद का सिहर उठे। उनका कहना था कि एक भी हत्यारोपी छूट जाता तो उनके साथ नाइंसाफी हो जाती। सबको सजा मिलना इंसाफ की जीत हुई है।