किला के पास ब्रजलोक कालोनी में रहने वाली शिक्षक निशा रानी 13 साल की बेटी गरिमा के साथ 15 दिन पहले अपनी बहन ममता के यहां काठमांडू गई थीं। 25 अप्रैल को जिस दिन उन्हें बरेली लौटना था, उसी दिन भूकंप आ गया। तीन दिन तक भूकंप से थर्राती काठमांडू की धरती पर हर पल मौत का सामना करने के बाद सोमवार को निशा किसी तरह काठमांडू से सुरक्षित निकलने में कामयाब हो सकीं। उनकी बहन भी अपने बच्चों के साथ आई हैं। निशा ने मंगलवार को अमर उजाला से बातचीत में भूकंप के बाद काठमांडू में गुजरे तीन दिनों की भयावह दास्तां साझा की। निशा के ही शब्दों में उनकी आपबीती...
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धरती हिली और जमींदोज होने लगीं इमारतें
शनिवार
25 अप्रैल को मुझे बरेली लौटने के लिए दोपहर दो बजे काठमांडू बस अड्डे पर पहुंचना था। मैं और मेरी बेटी तैयार हो रहे थे। हमने तय किया कि 12 बजे घर से निकल लेंगे लेकिन 10 मिनट पहले ही अचानक लगा कि धरती हिल रही है। हम तीसरी मंजिल पर थे। बहन ने बालकनी से बाहर झांका तो उसे चक्कर आने लगे। उसने चीखकर कहा कि भूकंप आ गया है। मैंने बाहर झांका तब तक आसपास की ऊंची-ऊंची इमारतें तेजी से हिलने लगी थीं। फिर एक-एक करके ये इमारतें दिखाई देने लगीं। बिल्डिंग के सारे लोग शोर मचाते हुए जीने से उतरकर बाहर भागने लगे। पास ही एक मैदान में पहुंचे जहां आसपास के सभी लोग आकर इकट्ठे हो रहे थे। अपनी आंखों के सामने अपने मकान गिरते देख सभी लोग चीख रहे थे। लोग मकानों के अंदर रह गए अपने सगे-संबंधियों को निकालने में जुटे हुए थे। कोई छत से कूद रहा था तो कोई कहीं को भागा चला जा रहा था। कोई गश खाकर गिर रहा था। कई सारे लोग एक-दूसरे को संभालने में लगे थे। हर तरफ जबरदस्त दहशत और भगदड़ का माहौल था। धरती रुक-रुककर लगातारहिलडुल रही थी।
खौफ के इसी माहौल में सैकड़ों-हजारों लोगों ने मैदानों में पनाह ली। करीब तीन घंटे में 36 बार भूकंप के झटके लगे। रोना-पीटना मचा हुआ था। सभी अपनी और अपने परिवार की जिंदगी के लिए भगवान से प्रार्थना कर रहे थे। जैसे-तैसे रात हुई लेकिन कोई नहीं सो सका। हम जिस मैदान में थे, वहां बहुत सारे लोग थे। हर तरफ इमारतों का मलबा बिखरा था और उनमें लोग दबे हुए जिदंगी बचाने के लिए जूझ रहे थे। आप यकीन नहीं करेंगे, आलम यह था कि लगातार भूकंप के झटकों के बीच बहुत सारे लोग अपनों को मलबे में दबा देखने के बाद भी उन्हें बचाने के लिए जोखिम उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे। कुछ लोग कोशिश करना चाहते थे लेकिन उनके अपने लोग उन्हें बिल्डिंग के पास नहीं जाने दे रहे थे। लाइट गुल हो चुकी थी। फोन ने भी काम करना बंद कर दिया था। मैंने फैसला कर लिया कि अगर बचे तो अपनी बहन और उसके बच्चों के साथ भारत लौटूंगी। उस रात की कल्पना अभी तक दिल को कंपकंपा रही है। भूकंप के झटकों के बीच तूफानी हवा के झोंके और ज्यादा दहशत पैदा कर रहे थे।
रविवार
फटे हाईवे, चीखते लोग और लाशों के ढेर
जैसे-तैसे रात कटी, सुबह होने से पहले ही हम तीन बजे एयरपोर्ट पहुंचने के लिए पैदल निकल पड़े। करीब 35 किमी पैदल सफर में रास्ते में जो मंजर देखा, वह याद आते ही दिल दहल जाता है। हाईवे तरबूज की तरह फट गए थे। जिधर देखो उधर जमींदोज इमारतें और चीखते लोग दिखाई दे रहे थे। खाने का बंदोबस्त क्या होता, पीने को पानी भी नहीं था। जिनके पास पानी की बोतलें थीं भी वह 200 एमएल की बोतल तीन सौ रुपये में बेच रहे थे। सुबह छह बजे हम एयरपोर्ट पहुंचे तो वहां 15 हजार से ज्यादा भारतीयों की भीड़ जुटी थी। हर किसी को फ्लाइट मिलना संभव नहीं था। बेकाबू लोगों को लाठीचार्ज करके भगाया जा रहा था। लगातार आ रहे भूकंप के झटकों के बीच सारे लोगों को एयरपोर्ट के बाहर समय काटना पड़ा। दिन गुजरा तो रात को हुई मूसलाधार बारिश के बाद ठंड ने सबको ठिठुरा दिया।
सोमवार
और आखिर जिंदगी ने उड़ान भरी
सुबह लगभग 11 बजे फिर बड़ा झटका लगा तो सबकी रही-सही हिम्मत भी टूटने लगी। लगा अब शायद बच नहीं पाएंगे। हम कभी एयरपोर्ट के अंदर भागते, कभी बाहर लेकिन फ्लाइट नहीं मिल रही थी। हर कोई परेशान था। छोटे-छोटे बच्चे जबरदस्त दहशत में थे और लगातार रो रहे थे। मेरी बेटी का भी रो-रोकर बुरा हाल था। वह तो अब भी वहां के हालात की कल्पना करके सिहर उठती है। पूरे 27 घंटे एयरपोर्ट के पास पड़े रहे। सोमवार शाम को एक फ्लाइट भारत जाने को तैयार हुई। हम भी हजारों लोगों के साथ लाइन में लग गए। सिर्फ तीस लोगों को उसमें बैठाया गया और हम दिल्ली पहुंच गए। हम खुद को खुशकिस्मत मानते हैं कि जिदंगी बच गई। वरना उम्मीद सारी खत्म हो चुकी थी। नेपाल में भूकंप के बाद गुजारे ये तीन दिन जिदंगी में कभी नहीं भूल पाऊंगी।