नगर निगम में सफाई के लिए लगे वाहनों में डीजल का खेल कोई नया नहीं है। नवनियुक्त नगर आयुक्त आरके श्रीवास्तव ने इसे समझा है इसलिए इस पर रोक लगाने के लिए वाहनों में जीपीएस लगाने की तैयारी कर रहे हैं। नगर निगम के सभी 118 से अधिक कूड़ा उठाने वाले वाहनों में यह सिस्टम लगाया जाएगा। हर साल 40 लाख रुपये से अधिक का डीजल निगम में खर्च होता है।
नगर निगम में खर्च हो रहे डीजल का कोई हिसाब नहीं है। गाड़ियों में कितना डीजल डालते हैं इसकी जानकारी तो है, लेकिन इस डीजल की खपत कैसे हो रही है इसका कोई रिकार्ड नहीं। नगर निगम में डीजल का खेल इतना बड़ा है कि अधिकारी इसे जानते हुए भी कोई कदम नहीं उठा सके हैं। बोर्ड की बैठक में पार्षद दल के नेता राजेश अग्रवाल ने तो इस व्यवस्था को बंद करके सीएनजी वाहन चलाने की वकालत की है। यही नहीं, सुधार के लिए जो रिपोर्ट बनाकर तत्कालीन स्वास्थ्य अधिकारी की ओर से नगर आयुक्त को सौंपी गई थी उसे भी लागू नहीं किया गया। नगर निगम में तीन गैराज और एक स्टोर है। प्रतिमाह एक लाख रुपए से अधिक का डीजल इनमें डाला जाता है। डीजल का चार्ज मुख्य सफाई निरीक्षक और हर स्टोर के लिपिक के पास है। गाड़ियों में डीजल कब डाला गया और गाड़ी कहां- कहां गई इसके लिए कोई रिकार्ड नहीं है। निगम की गाड़ियों को कौन चला रहा है इसका भी कोई रिकार्ड नहीं। कुछ गाड़ियों में तो नंबर प्लेट तक नहीं है।
चार नवंबर 2016 को नगर आयुक्त ने सभी सफाई निरीक्षक को आदेश जारी किया कि डोर टू डोर एजेंसियाें द्वारा नियमित कूड़े का उठान डलावघर से नहीं हो पा रहा है। उन्हाेंने आदेशित किया कि सभी वाहन चालक अपने साथ लॉग बुक रखे। कार्य के बाद पार्षद, सफाई नायक और निरीक्षक से इसे भरवाएं। बिना सत्यापन लॉग बुक वाले वाहनाें को डीजल न देने की बात कही गई थी। लेकिन यह भी लागू नहीं हो पाया।
इतना मिलता है रोज डीजल
तीन पहिया- 5 लीटर
जेसीबी- 35 लीटर
अन्य वाहन- 15 से 20 लीटर
जीपीएस और बायोमेट्रिक के लिए टेंडर कर रहे हैं। अगर मशीन खराब हुई तो कंपनी ही एक साल के अंदर बनाकर देगी। जल्द से जल्द इसे शुरू कर दिया जाएगा। रोजाना काफी डीजल नगर निगम में चोरी होता है।
आरके श्रीवास्तव, नगर आयुक्त