सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर उत्तर प्रदेश सरकार ने आठ जुलाई 2013 को दंड विधि (संशोधन) अधिनियम 2013 और भारत सरकार के पाक्सो अधिनियम (दि प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्रम सेक्सुअल आफेंस एक्ट 2012) को लागू कर दिया। इसके तहत बलात्कार की घटनाओं में पुलिस के लिए 37 कार्य बिंदु तय हैं। फरीदपुर में पांचवीं की छात्रा के साथ गैंगरेप की घटना की सूचना मिलने पर नियमानुसार थाने के ड्यूटी आफिसर ने न तो महिला पुलिस अधिकारी को बुलाया और न ही पीड़िता को कानूनी सहायता मुहैया कराने के लिए अधिवक्ता को बुलाया। अभियोग का पंजीकरण प्रभारी पुरुष थानाध्यक्ष ने किया जबकि यह जिम्मेदारी महिला पुलिस अधिकारी को निभानी थी। आरंभिक विवेचना भी महिला पुलिस अधिकारी ने नहीं की। हालांकि पीड़ित को चिकित्सकीय परीक्षण के लिए ले जाते समय महिला कांस्टेबल की सेवा जरूर ली गई। पीड़ित का बयान महिला पुलिस अधिकारी ने नहीं लिया और न ही यह बयान बच्ची से एकांत में लिया गया। पीड़िता और उसके परिवारवालों को बयान लेने से पहले उनके विधिक अधिकारों के बारे में भी नहीं बताया गया और सादी वर्दी में बच्ची से बयान लेने की बजाय बावर्दी यह बयान लिया गया। फील्ड यूनिट भी मौके पर साक्ष्य जुटाने नहीं गई। खानापूरी के लिए कपड़े वगैरह जरूर लैब जांच के लिए रख लिए गए। इस बयान की वीडियोग्राफी नहीं हुई। थाने में प्रकरण के दस्तावेजीकरण के दौरान वीडियो जरूर बनाई गई। मेडिकल परीक्षण से पहले नियमानुसार मनोचिकित्सकीय सेवाएं भी पीड़िता को नहीं मिलीं और परीक्षण के दौरान महिला चिकित्सक के साथ नियमविरुद्ध पुरुष चिकित्सक भी मौजूद थे।