कंट्रोलर एंड आडिटर जनरल (सीएजी) की एक रिपोर्ट ने उत्तर प्रदेश की पंचायती व्यवस्था पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। इसमें खुलासा किया गया है कि उत्तर प्रदेश के अधिकांश जिलों की पंचायतों को सिर्फ प्रधान और सचिव चला रहे हैं। इन पंचायतों में पिछले पांच सालों में खुली बैठकें नहीं हुईं लिहाजा विकास के फैसले खुली बैठकों में करने की व्यवस्था ही ध्वस्त होकर रह गई। कैग की इस रिपोर्ट के बाद प्रदेश के ग्राम्य विकास और पंचायत विभाग ने पंचायती राज व्यवस्था का नया मॉडल तैयार करने की पहल की है जिसे पंचायत चुनाव होते ही लागू कर दिया जाएगा।
कैग ने अपनी रिपोर्ट में ग्राम पंचायतों में खुली बैठकें न होने का हवाला देते हुए कहा है कि पंचायतों में कराए गए 50 फीसदी से ज्यादा कामों में धनराशि का दुरुपयोग हुआ है। इसी वजह से गांवों में विकास कार्य भी असंतुलित ढंग से हुए हैं। ग्राम प्रधान और सचिव ने जो चाहा वहीं कराया। जहां निर्माण और विकास की जरूरत थी, वहां उसकी उपेक्षा की गई। खुली बैठकों में प्रस्ताव पारित होने के बाद विकास कार्य होते तो गांवों में विकास का संतुलन बना रहता।
कैग की इस रिपोर्ट को प्रदेश के ग्राम्य विकास और पंचायत विभाग ने गंभीरता से लेते हुए पिछले सप्ताह जिला पंचायतराज अधिकारियों की लखनऊ में दो दिवसीय कार्यशाला आयोजित की थी। इसमें प्रमुख सचिव ग्राम्य विकास और पंचायतीराज के सचिव ने कैग की इस रिपोर्ट के बारे में बताया। कार्यशाला में भविष्य में कैग की इस तरह की टिप्पणी से बचने के लिए कारगर उपाय करने पर मंथन भी हुआ। प्रमुख सचिव पंचायतीराज ने कैग की रिपोर्ट का अध्ययन कर उसके आधार पर नया मॉड्यूल तैयार करने के लिए विशेषज्ञों की कमेटी बना दी है। उसी कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर सितंबर-अक्टूबर में निर्वाचित होने वाले प्रतिनिधियों को दो फेज में प्रशिक्षण दिया जाएगा।
नए पंचायत प्रतिनिधि तीन महीने तक विकास के लिए मिली धनराशि का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे। इस अवधि में पंचायत सचिव और पंचायत प्रतिनिधियों का दो चरण में प्रशिक्षण होगा। पहले चरण में प्रधान और अन्य प्रतिनिधियों को दायित्व बताए जाएंगे। दूसरे चरण में काम करने का तरीका। इसके लिए विशेषज्ञों की टीम मॉडल तैयार कर रही है। -टीसी पांडेय, डीपीआरओ