बहादुर लड़की ही राष्ट्र और परिवार के निर्माण में अहम भूमिका निभा सकती है, यही सोचकर बच्चियों को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण देने की जरूरत महसूस की गई। सर्व शिक्षा अभियान के तहत सरकार ने लाखों रुपये खर्च करके तीन माह के प्रशिक्षण का प्रोग्राम बनाया पर भ्रष्ट अफसरों ने इसमें भी कमाई का रास्ता खोज लिया। कस्तूरबा स्कूलों में बच्चियों को जनवरी से मार्च तक ताइक्वांडो प्रशिक्षण दिया जाना था, लेकिन अफसरों ने इसमें भी खेल कर दिया। उन्होंने प्रशिक्षण की अवधि ही घटाकर एक महीना कर दी, ताकि दो माह का रुपया हड़पा जा सके।
छात्राओं को तीन महीने के कोर्स की महीने भर में मिलेगी ट्रेनिंग
बरेली। जनवरी से मार्च तक 18 कस्तूरबा विद्यालयों में हर दिन डेढ़ घंटे ताइक्वांडो प्रशिक्षण की क्लास लगाई जानी थी। इसके लिए अल्पकालीन प्रशिक्षकों की नियुक्ति दिसंबर में हो जानी चाहिए थी, पर चयनित प्रशिक्षकों को 23 फरवरी को नियुक्ति पत्र मिल सका, इसमें उनकी संविदा 31 मार्च को समाप्त हो जाएगी। कुछ बा स्कूलों में प्रशिक्षक 24 तारीख से आईं। चार दिन कक्षाएं लीं, समय पर कोर्स पूरा कराने के लिए प्रशिक्षकों ने दो घंटे से अधिक समय तक क्लास ली। 28 तारीख से स्कूल बंद हो गए।
दो माह का मानदेय हड़पने की कोशिश
प्रशिक्षकों को तीन महीने तक हर माह पांच हजार रुपये मानदेय दिया जाना है। अब जबकि प्रशिक्षण ही मार्च में चलेगा तो अफसर सिर्फ महीने भर का मानदेय देकर प्रशिक्षकों को निपटा देंगे। बाकी दो माह के पांच-पांच हजार रुपये का 18 प्रशिक्षकों का मानदेय अफसर हड़प लेंगे।
गाइड और खेल की यूनिफार्म तक नहीं
स्काउट गाइड, पीटी और नियमित खेल छात्राओं को कराया जाना अनिवार्य है, लेकिन स्कूलों में इसके लिए जरूरी यूनिफार्म तक नहीं है। हर साल 18 विद्यालयों की 1800 छात्राओं को गाइड की यूनिफार्म, पीटी के जूते और खेल के लिए ट्रैक सूट खरीदने का रुपया भेजा जाता है पर स्थिति यह है कि इस सेशन में छात्राओं को जिला स्तरीय खेल प्रतियोगिता में प्रतिभाग कराने की बारी आई तो इधर-उधर से जुगाड़ करके जूते उपलब्ध कराए गए। किसी भी स्कूल में छात्राओं के पास तीनों यूनिफार्म नहीं हैं।
प्रमाणपत्र में हो रहा है खेल
किसी भी प्रतियोगिता या प्रशिक्षण का प्रमाणपत्र छात्राओं को उपलब्ध नहीं कराया जाता। कस्तूरबा स्कूलों में हालात इतने खराब हैं कि पहली बार आयोजित की गई खेल प्रतियोगिता में जिला और मंडल स्तर पर जीतने वाली खिलाड़ियों को आज तक प्रमाणपत्र नहीं मिले हैं। प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने में साल भर से खेल चल रहा है। स्कूलों में गाइड का सात दिवसीय प्रशिक्षण नवंबर में हुआ पर छात्राओं को इसके भी प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं कराए गए। प्रमाणपत्र के लिए जिला स्काउट संस्थान में फीस जमा करनी होती है। इससे बचने के लिए अफसर प्रमाणपत्र ही नहीं बांट रहे हैं।