हाथियों को खदेड़ने का एक ही रास्ता.. ऑपरेशन ‘हांका’
क्रासर
ऑपरेशन ‘खेड़ा’ के लिए नहीं मिल रहे योग्य महावत, ट्रेक्युलाइज करना भी आसान नहीं
अमर उजाला ब्यूरो
बरेली। बहेड़ी में उत्पाती हाथी के एक किसान की जान लेने के बाद लोगों में खौफ बैठ गया है। हालांकि, हाथियों को बरेली की सीमा से बाहर भेज दिया गया है, लेकिन ऐसे में कुशल महावतों की कमी वन विभाग को जरूर खल रही है। कभी समय था जब मतवाले हाथियों को बस में करने के साथ जंगली हाथी को पकड़ कर उसे पालतू बनाने की कुव्वत महावतों में होती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं रह गया है। हाथियों को ट्रेंक्युलाइज करना भी आसान नहीं। लिहाजा हाथियों को खदेड़ने के लिए वन विभाग के पास ऑपरेशन ‘हांका’ ही एक मात्र विकल्प रह जाता है।
वन संरक्षक पीपी सिंह के मुताबिक, पहले वन विभाग के पास पहले कुशल महावत होते थे। वे अपने पालतू हाथियों के सहारे जंगली हाथी को पकड़ लेते थे। इसे आपरेशन ‘खेड़ा’ कहा जाता था। इसमें कई पालतू हाथियों पर सवार होकर महावत योजनाबद्ध तरीके से जंगली हाथी को घेरकर उसके पैर में लोहे की जंजीर पहना देते थे। उन्होंने स्वीकार किया कि अब ऐसे ट्रेंड महावतों का अभाव है। जो नये महावत हैं, वह इस तरह के आपरेशन को अंजाम नहीं दे सकते। जंगली हाथियों को ट्रेंक्युलाइज भी नहीं किया जाता। इसमें खतरा ये है कि बेहोश होने पर हाथी अगर उल्टी दिशा में लेट गया तो विशालकाय शरीर के कारण हृदय गति रुक सकती है।
उन्होंने बताया कि भटके हाथियों को उनके ठिकानों पर पहुंचाने के लिए सिर्फ एक तरीका बचता है, जिसे आपरेशन ‘हांका’ कहा जाता है। इसमें तीन तरफ से घेरा बना कर जिधर हाथी को खदेड़ना हो उदर का रास्ता खुला छोड़ दिया जाता है। ढोल, तासे, पटाखे की आवाजा का भी सहारा लिया जाता है। उन्होंने बताया कि रामपुर के वनकर्मी भी फिलहाल इसी के तहत अभियान में जुटे हैं। वन संरक्षक ने बताया कि हाथी के विशालकाय शरीर को देख यह समझने की भूल भी नहीं करनी चाहिए कि वह दौड़ नहीं पाएगा। जंगली हाथी 60-80 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौैड़ सकता है। इसलिए हाथी दिखने पर पर्याप्त दूरी रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह अलग बात है कि हाथी अधिकतम दस मिनट तक ही दौड़ सकता है।