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आईवीआरआई का टैग लगे तीन गोवंशीय पशु बरामद, दो तस्कर गिरफ्तार

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बरेली। गोवंशीय पशुओं के वध को लेकर भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) की संलिप्तता पर संस्थान के एक वैज्ञानिक लंबे समय से सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि आईवीआरआई बीमार और बूढ़े हो चुके, ऐसे पशुओं को नीलाम करता है जो किसी काम के नहीं रहते। ऐसे पशु जब आईवीआरआई के काम के नहीं हैं तो किसान उन पशुओं को खरीदकर क्या करेगा। जाहिर सी बात है आईवीआरआई किसान की शक्ल में नीलामी में शामिल पशु तस्करों को इन्हें बेच देता है या फिर दलालों के माध्यम से यह पशु उन तक पहुंच जाते हैं। सोमवार को बारादरी पुलिस ने आईवीआरआई का टैग लगे तीन गोवंशीय पशुओं को बरामद कर दो पशु तस्करों को गिरफ्तार किया। ऐसे में आईवीआरआई पर लगाए वैज्ञानिक के दावों को बल मिलता नजर आ रहा। अब मंगलवार को पुलिस आईवीआरआई में इस संबंध में जांच करेगी कि तस्करों तक यह पशु कैसे पहुंचे।
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सोमवार शाम पांच बजे करीब बारादरी पुलिस को शाहदाना चौराहे से टाटा मैजिक में तीन गोवंशीय पशुओं को नशा देकर मोहल्ला कोट में चांद खां की डेयरी ले जाने की सूचना मिली। इंस्पेक्टर केवी सिंह मौके पर पहुंचे तो पशुओं को वहां बांधा जा रहा था। पुलिस को देखते ही दो आरोपी भाग गए जबकि दो मौके से पकड़े गए। गिरफ्तार आरोपी जुबैर और कासिम सैलानी के रहने वाले हैं। वायरलेस पर सूचना होने से दो अन्य थानों की पुलिस भी पहुंच गई। मौके से बरामद गोवंशीय पशुओं को पुलिस ने ले जाने का प्रयास किया तो वे नशे में मिले। दो जानवर तो किसी तरह थाने भेज दिए लेकिन तीसरी नशे के चलते नहीं उठ सका। उसे डेयरी मालिक चांद के सुुपुर्द कर दिया। इंस्पेक्टर केवी सिंह ने बताया कि जांच में पता लगा है कि आईवीआरआई से नीलामी में तीनों पशु खेती के लिए खरीदे गए थे, लेकिन काटने ले जाए जा रहे थे। मंगलवार को आईवीआरआई के अधिकारियों से इसकी जानकारी ली जाएगी।

भाग जाते हैं तस्कर, पुलिस को मिलते सिर्फ वाहन और पशु
बरेली। तस्करों और पुलिस के गठजोड़ से पशु तस्करी का धंधा जिले में फलफूल रहा है। पिछले दिनों एक सिपाही की हत्या के बाद भी इस धंधे पर लगाम नहीं लग सकी है। पशु तस्करी की घटनाओं में अक्सर पुलिस के हाथ वाहन और पशु हाथ लगते हैं। तस्कर मिलते नहीं, अगर मिलते हैं तो सिर्फ ड्राइवर। वाहनों पर भी नंबर प्लेट होती और होती है तो नंबर फर्जी निकलता है।
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नवाबगंज में छह महीनों में कई ऐसे मामले हुए जिनमें पुलिस को कोई तस्कर हाथ नहीं आया। 18 फरवरी को टांडा गांव में दबिश के दौरान पशु तस्कर फायरिंग करते फरार हो गए। दिसंबर में सेंथल जादोंपुर मार्ग पर लग्जरी गाड़ी में ले जाए जा रहे गोवंशीय पशुओं की घेराबंदी तो तस्कर फायरिंग कर गन्ने के खेत में निकल गए। जनवरी में पीलीभीत हाईवे पर हरदुआ गांव के पास गोवंशीय पशुओं से भरी काली स्कार्पियो पकड़ी लेकिन तस्कर गाड़ी से कूदकर फरार हो गए। गाड़ी नंबर भी फर्जी निकला। चार मार्च को घर में गोवध की सूचना पर छापा मारा तो सिर्फ मांस ही मिल सका। ऐसे ही हाफिजगंज के ढकिया गांव में 12 फरवरी को पशु चुराकर ले जा रहे तस्करों को गांव वालों ने पुलिस के संग घेरा तो तस्कर फायरिंग कर भाग निकले थे। 11 नवंबर 2018 को लग्जरी कार की घेराबंदी में भी सिर्फ पशु ही बरामद हुए।
मीरगंज थाने में साल भर में गोकशी और गोवंश की तस्करी के 14 मामले दर्ज हुए। शाही में वर्ष 2018 में दो मुकदमे दर्ज हुए। तत्कालीन थाना प्रभारी सुधीश सिंह सिरोही पर तस्करों ने पीछा करने पर फायरिंग भी की थी। मगर इस मामले में पुलिस ने सिर्फ एक तस्कर तौफीक के विरुद्ध ही मामला दर्ज किया। बाद में तौफीक कोर्ट में सरेंडर हो गया।

विधायक की गाय काटने वाले को उसी दिन मिली जमानत
पशु तस्करी को रोकने के लिए सरकार भले ही तमाम दावे करे लेकिन आईपीसी की धाराओं में पशु तस्करी को संज्ञेय अपराध नहीं माना गया है। इसमें सात साल से कम सजा का प्रावधान है। ऐसे में घटना के बाद गिरफ्तारी होने पर भी आसानी से जमानत मिल जाती है। बिथरी विधायक पप्पू भरतौल के भाई के मीरगंज स्थित स्कूल से चोरी करके तीन गाय काटने के आरोपियों को भी गिरफ्तारी के दिन ही जमानत मिल गई थी।

ऐसा नहीं है कि हर बार पशु तस्कर हाथ से निकल जाते हैं। कई मामलों में पुलिस उनकी मौके पर गिरफ्तारी करती है तो कई बार उन्हें बाद में पकड़कर जेल भेजा जाता है। हां, यह बात सही है कि अक्सर इनके वाहनों पर नंबर सही नहीं होते जिसकी वजह से फरार तस्करों को चिह्नित कर गिरफ्तार करने में समस्या आती है। - डॉ. संसार सिंह, एसपी देहात
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