बरेली। पिता है तो बच्चों के ढेर सारे सपने हैं, पिता है तो बाजार के सब खिलौने अपने हैं...। पंडित ओम व्यास की लिखीं ये पंक्तियां जीवन में पिता के महत्व का खूब वर्णन करती हैं। पापा... यूं तो महज दो अक्षर हैं, लेकिन इन दो अक्षरों के ईद गिर्द बच्चों के शौक, खुशियां, उमंग, आंखों की चमक और जिंदगी बरकरार रहती है। कहते हैं कि संतान का हित मां-बाप से ज्यादा दूसरा कोई चाह नहीं सकता। और अगर मां न हो तो हित की चाहने पूरी जिम्मेदारी पिता पर आ जाती है। फादर्स डे के मौके पर आज हम ऐसे पिताओं के संघर्ष की कहानी बता रहे हैं जिन्होंने यह चरित्रार्थ किया कि यदि पिता अपने बच्चे के साथ है तो परेशानियां, अक्षमताएं, परिस्थितियां उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकतीं।
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अक्षमताओं में तलाशी खूबी और बना दिया रीयल हीरो
लक्ष्मीपुर गौंटिया के रहने वाले गुड्डू बचपन से ही सुनने और बोलने में अक्षम हैं। परिवार को इसका पता चला तो पिता महेंद्र पाल को बुरा तो लगा, लेकिन बेटे के सामने कभी जाहिर नहीं होने दिया। बेटा जैसे-जैसे बड़ा हुआ उसके मन में यह बात बिठाई कि न बोल पाने में निराश होने जैसा कुछ नहीं है। अपनी बात जाहिर कर सकने के लिए लिखना सिखाया। संकेतिक विद्यालय में प्रवेश दिलाया। वक्त के साथ यह पता लगा कि बेटा अच्छा दौड़ सकता है तो अच्छे कोच की शरण दिलाई। आर्थिक तंगी के बीच बेटे के भविष्य के लिए अथक प्रयास किए। गुड्डू के पिता महेंद्र पाल रिक्शा चलाकर घरों में गैस सिलिंडर पहुंचाने का काम करते हैं। नियमित अभ्यास, अच्छा पोषण देने का भरसक प्रयास किया। 21 साल के गुड्डू ने भी पिता की मेहनत को व्यर्थ नहीं जाने दिया। हाल ही में नेशनल खेलों में रजत पदक हासिल किया है। कोच अजय कश्यप ने बताया कि गुड़्डू 2024 में ब्राजील में आयोजित होने वाली इंटरनेशनल दौड़ में हिस्सा लेंगे। गुड़्डू के पिता महेंद्र पाल का कहना है कि बेटे को पैरालंपिक्स में दौड़ते देखना चाहते हैं।
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बच्चों के लिए मां बन गए पिता, खुद का जीवन भूले
शहर के इंटरनेशनल सिटी कॉलोनी निवासी डॉ. अनुराग गौतम अपनी सफलता का श्रेय सिर्फ और सिर्फ पिता लाल बहादुर के त्याग और समर्पण देते हैं। डॉ. गौतम वर्तमान में फरीदपुर सीएचसी के चिकित्सा अधीक्षक और सर्विलांस सेल प्रभारी हैं। उन्होंने बताया कि जब वे दो साल के थे तभी उनकी मां का निधन हो गया था। तब बड़े भाई, बहन और मेरे पालन पोषण की जिम्मेदारी उन पर आ गई थी। डॉ. गौतम ने बताया कि हम बच्चों के पालन-पोषण में कोई परेशानी न आए इसलिए उन्होंने दूसरी शादी नहीं की, जबकि रिश्ते खूब आते थे। हम सभी के लिए उन्होंने पूरा जीवन समर्पित कर दिया। मां का प्यार और दुलार तो मिला ही। उन्होंने अपनी भूमिका ऐसी बदली कि मां की कमी महसूस नहीं होने दी। सुबह उठकर स्कूल भेजने के लिए तैयार करते। खाना बनाते। कपड़े धोने से लेकर सभी घरेलू जिम्मेदारी निभाते। साथ ही, बेहतर शिक्षा के लिए प्रोत्साहित भी करते। पिता चाहते थे कि हम पढ़ लिखकर काबिल बनें। इसी से प्रेरित होकर हमने कड़ी मेहनत की। मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास कर सरकारी मेडिकल कॉलेज मेरठ में एमबीबीएस और फिर केजीएमयू लखनऊ में एमडी में दाखिल लिया। अब मैं बतौर चिकित्साधीक्षक जनता को स्वास्थ्य सेवाएं दे रहा हूं। पिता आज हम सभी बेटों को सफल देखते हैं तो उनकी आंखें चमक जाती हैं।