सपा नेताओं का दावा है कि मुस्लिम मतदाता उन्हें छोड़कर कहीं नहीं गए। मतदाताओं पर मौलानाओं के बयानों के असर को वे सिरे से खारिज करते हैं। हालांकि, खारिज करने की कोई स्पष्ट वजह बताने की स्थिति में नहीं हैं। यह जरूर कहते हैं कि 13 मई का इंतजार करें। बसपा से जुड़े नेता कहते हैं कि बड़े दलों में सिर्फ उन्होंने ही महापौर पद पर मुस्लिम प्रत्याशी उतारा।
दावा है कि इसका लाभ भी उनको मिल रहा है। मौलानाओं के बयान को वह अपने लिए अवसर के रूप में मानते हैं। कांग्रेसी भी लगभग इसी लाइन पर हैं और मौलानाओं के बयान से खुद को मजबूती मिलने का दावा कर रहे हैं। कांग्रेसियों का तर्क है कि मुसलमान कभी उन्हीं का काडर वोटर रहा है। सभी दलों का चाल-चरित्र देखने के बाद अब वे घर वापसी कर रहे हैं।
मुस्लिम मतों में बिखराव हुआ तो...
शहर की राजनीति को लंबे समय से नजदीक से देख-समझ रहे कुछ पुराने नेताओं का मानना है कि मुस्लिम मतों में बिखराव हुआ है तो वर्ष 2017 जैसी स्थिति बनेगी। इससे स्पष्ट है कि भाजपा के उमेश गौतम और सपा समर्थित डॉ. आईएस तोमर बेहद करीबी मुकाबले में होंगे और हार-जीत का अंतर भी बहुत बड़ा नहीं होगा। नतीजे चौंका सकते हैं पर मुकाबले की सूरत नहीं बदलने वाली।
मौलानाओं के बयानों का असर
तीन तलाक जैसे ज्वलंत मसलों के बाद देखा जाए तो मौलानाओं के बयानों और फतवों पर अब मुस्लिम मतदाता बहुत खुलकर प्रतिक्रिया नहीं देते। वे अपना नफा-नुकसान देखकर ही लाइन तय करते हैं। चुनाव की शुरुआत से ही यह चर्चा रही कि मुस्लिम मतदाता उसी के पाले में होगा, जो भाजपा के खिलाफ मजबूती से खड़ा नजर आएगा। हालांकि, इसे लेकर आम मुस्लिमों के बीच से ऐसी कोई प्रतिक्रिया सुनने को नहीं मिली। इसी खामोशी ने मतदान के बाद राजनीतिक दलों की उधेड़बुन बढ़ा दी है।