फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मुस्लिम मतदाताओं की खामोशी से सब बैचेन: किस सिर सजेगा जीत का ताज, राजनीतिक पंडित भी नहीं भांप पा रहे माहौल

Fri, 12 May 2023 06:47 AM IST
मुकेश कुमार अमर उजाल ब्यूरो, बरेली

सार

बरेली में निकाय चुनाव के लिए मतदान संपन्न हो गया। सभी प्रत्याशी अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। इन सबके बीच एक बात सभी को बेचैन कर रही है कि वो है मुस्लिम मतदाताओं की खामोशी। इस खामोशी में किसकी जीत छिपी है, यह मतगणना के बाद ही पता चल सकेगा। 
विज्ञापन
मुस्लिम मतदाता - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

निकाय चुनाव में बरेली के मतदाताओं की बेरुखी ने प्रत्याशियों की बेचैनी बढ़ा दी है। लगभग चार फीसदी कम मतदान का किसे नुकसान और किसे फायदा, इस पर सभी अपने-अपने हिसाब से उधेड़बुन में जुटे हैं। प्रत्याशियों की सबसे ज्यादा मुस्लिम मतदाताओं की खामोशी बेचैन कर रही है। हालांकि, इस तथ्य से किसी को इनकार नहीं कि मुकाबला बेहद करीबी है और हार-जीत का अंतर पिछली बार से भी कम होने की उम्मीद है। मतदाताओं ने किसे चुना है, यह शनिवार को मतगणना के बाद ही पता चल सकेगा।  

विज्ञापन


मुस्लिम मतदाताओं की खामोशी को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के नेताओं के अपने-अपने दावे हैं। भाजपाई खेमे की नजर से देखें तो मुस्लिम वोट एकमुश्त नहीं गया है। इसके पीछे तर्क यह है कि कुछ मौलानाओं की बयानबाजी से मुसलमान मतदाता भ्रमित हो गए। इसके पीछे आईएमसी के अध्यक्ष मौलाना तौकीर रजा खान और मौलाना शहाबुद्दीन के उन बयानों का हवाला दिया जा रहा है, जिसमें उन्होंने भाजपा और सपा से अलग दूसरे विकल्पों पर विचार करने की अपीलें की थीं। 

भाजपाई कर रहे यह दावा 

भाजपाई यह भी मानते हैं कि तीन तलाक का मुद्दा, जिसके खिलाफ बरेली से ही आवाज बुलंद हुई थी, इसका लाभ उन्हें अब भी मिल रहा है। दावा है कि शिक्षित मुस्लिम महिलाएं अब उन्हीं के पाले में हैं। आला हजरत दरगाह के सज्जादानशीन अहसन मियां को भी ऐसे देखे जा रहा है कि पहले चरण में कम मतदान होने के बाद उन्होंने कहा था कि जो आपकी फिक्र करता हो, ऐसे प्रत्याशी को वोट जरूर देना।

UP Nikay Chunav: मतदान के दिन मनाई छुट्टी, बरेली नगर निगम वाले रहे फिसड्डी; जानिए निकायवार मतदान प्रतिशत

विज्ञापन

सपा नेताओं का दावा है कि मुस्लिम मतदाता उन्हें छोड़कर कहीं नहीं गए। मतदाताओं पर मौलानाओं के बयानों के असर को वे सिरे से खारिज करते हैं। हालांकि, खारिज करने की कोई स्पष्ट वजह बताने की स्थिति में नहीं हैं। यह जरूर कहते हैं कि 13 मई का इंतजार करें। बसपा से जुड़े नेता कहते हैं कि बड़े दलों में सिर्फ उन्होंने ही महापौर पद पर मुस्लिम प्रत्याशी उतारा। 

दावा है कि इसका लाभ भी उनको मिल रहा है। मौलानाओं के बयान को वह अपने लिए अवसर के रूप में मानते हैं। कांग्रेसी भी लगभग इसी लाइन पर हैं और मौलानाओं के बयान से खुद को मजबूती मिलने का दावा कर रहे हैं। कांग्रेसियों का तर्क है कि मुसलमान कभी उन्हीं का काडर वोटर रहा है। सभी दलों का चाल-चरित्र देखने के बाद अब वे घर वापसी कर रहे हैं।

मुस्लिम मतों में बिखराव हुआ तो...

शहर की राजनीति को लंबे समय से नजदीक से देख-समझ रहे कुछ पुराने नेताओं का मानना है कि मुस्लिम मतों में बिखराव हुआ है तो वर्ष 2017 जैसी स्थिति बनेगी। इससे स्पष्ट है कि भाजपा के उमेश गौतम और सपा समर्थित डॉ. आईएस तोमर बेहद करीबी मुकाबले में होंगे और हार-जीत का अंतर भी बहुत बड़ा नहीं होगा। नतीजे चौंका सकते हैं पर मुकाबले की सूरत नहीं बदलने वाली।

मुस्लिम मत एकमुश्त पड़ा तो...

तमाम गुणा-भाग के बीच माना यही जा रहा है कि मुस्लिम मतदाता बिखरे नहीं हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो वे जिस तरफ गए हैं, एकजुट होकर। तमाम दावों के बीच इनके एक साथ सपा या बसपा में जाने की चर्चाएं हैं। सपा इसलिए, क्योंकि भाजपा के मुकाबले वही एक पार्टी मजबूती से खड़ी नजर आ रही है। बसपा को लेकर चर्चा सिर्फ प्रत्याशी के मुस्लिम होने के कारण है। कम वोट प्रतिशत इस ओर इशारा कर रहा है कि मुसलमान एक साथ सपा में गए हैं तो तस्वीर पलट भी सकती है। फिलहाल, इंतजार 13 मई का रहेगा।
 
विज्ञापन

मौलानाओं के बयानों का असर

तीन तलाक जैसे ज्वलंत मसलों के बाद देखा जाए तो मौलानाओं के बयानों और फतवों पर अब मुस्लिम मतदाता बहुत खुलकर प्रतिक्रिया नहीं देते। वे अपना नफा-नुकसान देखकर ही लाइन तय करते हैं। चुनाव की शुरुआत से ही यह चर्चा रही कि मुस्लिम मतदाता उसी के पाले में होगा, जो भाजपा के खिलाफ मजबूती से खड़ा नजर आएगा। हालांकि, इसे लेकर आम मुस्लिमों के बीच से ऐसी कोई प्रतिक्रिया सुनने को नहीं मिली। इसी खामोशी ने मतदान के बाद राजनीतिक दलों की उधेड़बुन बढ़ा दी है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें