लॉकडाउन- 4 की शुरुआत बरेली के लिए बड़े खतरे लेकर आई है। पाबंदियों में छूट मिलते ही शहर में हर तरफ भीड़ बेलगाम होने लगी है। दुकानदारों ने बाजार खोलने की अनुमति लेते वक्त प्रशासन से जो वादे किए थे, दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ के बीच अब उन्हें याद रखने की भी फुर्सत उनके पास नहीं रह गई है। ट्रैफिक पुलिस यूं बाकी सारे वाहनों को चेक कर रही है लेकिन शहर में बगैर इजाजत घुसते भारी वाहनों और लोगों को सटकर बैठने के लिए मजबूर करते ई रिक्शा और टेंपों पर उसकी भी नजर नहीं है। उधर, कोरोना को साथ लेकर आ रहे प्रवासी मजदूरों के लौटने का सिलसिला जारी है। अफसर भले ही कह नहीं पा रहे हैं लेकिन बेतहाशा सरकारी रियायतों के बीच लॉकडाउन का पालन कैसे कराया जाए, उनकी समझ में नहीं आ रहा है। दूसरी बुरी खबर यह है कि आईवीआरआई की लैब में कोरोना के नमूनों की जांच की रफ्तार लगातार धीमी होती जा रही है। शनिवार को पहला दिन था जब जांच के लिए इस लैब में बरेली का एक भी सैंपल नहीं भेजा गया। हालात साफ इशारा कर रहे हैं कि कोरोना के मरीज अगर एकाएक बढ़े तो फिलहाल उनका पता लगना भी मुश्किल है।
लॉकडाउन फोर: सरकार के फरमान ने फंसा दी पुलिस की गर्दन
बाजार और वाहनों का संचालन खोलने से पुलिस तय नहीं कर पा रही प्राथमिकता
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नए केस मिलने से कोरोना के सामुदायिक संक्रमण के आसार, भीड़ बढ़ा रही खतरा
बरेली।कोरोना को रोकने के लिए लोगों के बीच दूरी रखने के अलावा अब तक कोई और रास्ता नहीं मिला है, इसके लिए कहने को लॉकडाउन अब भी लागू है लेकिन फिर भी बाजार को इतनी ज्यादा रियायतें मिल गई हैं कि पुलिस-प्रशासन की समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर कैसे लोगों के बीच दूरी बनाकर रखी जाए। लॉकडाउन- 4 में ज्यादातर बाजार खुल जाने के बाद सड़कों पर एकाएक लोगों की आवाजाही इस कदर बढ़ गई है कि चौराहों पर खड़ी पुलिस तमाशाई बनकर देखने के अलावा कुछ नहीं कर पा रही है। जिन व्यापारी संगठनों से सामाजिक दूरी की पाबंदी के साथ बाजार खोलने के लिए जरूरी शर्तें तय की गई थीं, वे अब कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। रियायतें चूंकि सरकार की ओर से मिली हैं लिहाजा अफसर खुलकर कुछ कह भी नहीं पा रहे हैं। हालांकि रिटायर्ड पुलिस अफसर खुलकर कह रहे हैं कि सिर्फ अर्थव्यवस्था के नाम पर इतना बड़ा जोखिम लेना ठीक नहीं है। देश के लोग इतने जागरूक नहीं हैं कि दूसरे देशों का हाल देखकर सबक ले पाएं। बहुत ज्यादा रियायतें पुलिस-प्रशासन की चुनौतियां बढ़ाने केसाथ उनकी जान जोखिम में डालने जैसी साबित होंगी।
भारी पड़ सकते हैं दबाव में लिए फैसले
मेरे हिसाब से लॉकडाउन और लंबे समय रहना चाहिए था। अर्थव्यवस्था और गरीबों को भुखमरी से उबारने के लिए दूसरे उपाय किए जा सकते थे। सरकार ने उद्योगपतियों और व्यापारिक संगठनों के दबाव में ने जो फैसले लिए गए हैं, वे भविष्य में भारी पड़ सकते हैं। सबकुछ खोलकर ऐसे लोगों को भी ऊपरवाले के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया है जो इस भयानक बीमारी को लेकर जागरुक हैं और अब तक अपना पूरा बचाव करते आए हैं।- राघवराम मिश्रा, रिटायर्ड इंस्पेक्टर
अपनी परवाह खुद करें, कोई नहीं बचाने वाला
पुलिस की संख्या सीमित है और वह इस तरह के माहौल में पब्लिक पर दबाव नहीं बना सकती। पुलिस को नहीं पता कि किसकी दुकान खुलनी है और किसकी नहीं। उसे वाणिज्य से जुड़े विभागों या प्रशासनिक अधिकारियों के आदेश का इंतजार रहता है जो आगे नहीं आ रहे। ऐसे हालात में पुलिस खुद दिशाहीन हो गई है। वह सामान्य रूप से वाहन चेकिंग का पुराना काम ही कर सकती है। जिस तरह से केस बढ़ रहे हैं, बेशक हालात विस्फोटक हो सकते हैं। - जगदीश अरोरा, रिटायर्ड इंस्पेक्टर
खुद को जेल से छूटा कैदी मानकर मनमानी कर रहे लोग
लॉकडाउन-4 में मिली राहत को लोग हजम नहीं कर पा रहे। वे समझ रहे हैं कि सरकार ने अब तक बेवजह ही उन्हें घरों में कैद कर रखा था। इसीलिए आजादी मिलते ही बाजार में घूमने या पार्टी करने का मौका नहीं छोड़ रहे। पुलिस रोके भी तो लोग यह कहते निकल जाते हैं कि जब सरकार ने दे दी है तो आप क्यों रोक रहे हो। यह स्थिति इसलिए और खतरनाक है जब मुंबई जैसे तमाम शहरों से आए मजदूरों से सामुदायिक संक्रमण लगातार फैल रहा है। लोगों का यह कहना खुदगर्जी की ही मिसाल है कि भारत की जनसंख्या एक अरब 33 करोड़ है। अगर एक लाख मर भी गए तो क्या फर्क पड़ेगा। वे नहीं समझ रहे कि अगर उनके परिवार के किसी सदस्य के साथ ऐसा हुआ तो क्या यही कहेंगे। सभी को इस विषय पर गंभीर होना चाहिए। - डॉ. हेमा खन्ना, मनोवैज्ञानिक
पब्लिक अभी समझ ले तो ठीक: एडीजी
सरकार ने जो छूट दी है लोग वाकई उसका गलत इस्तेमाल कर रहे हैं और इससे कोरोना संक्रमण बढ़ सकता है। ज्यादा हालत खराब हुई तो कर्फ्यू जैसी स्थिति बन सकती है। लोगों को समझना चाहिए कि कोरोना तेजी से फैल रहा है, इसलिए बिना जरूरत बाहर न निकलें और दूसरों को भी समझाएं। - अविनाश चंद्र, एडीजी जोन