बरेली। अगस्त क्रांति से लेकर आजादी दिलाने तक, शहर के ऐतिहासिक बरेली कॉलेज के शिक्षकों और विद्यार्थियों का खासा योगदान रहा। यहां के जांबाज विद्यार्थियों ने अंग्रेजी हुकूमत की नाक में दम कर दिया था। राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले आंदोलनों में भी बढ़-चढ़कर भूमिका निभाई थी।
इतिहासकार डॉ. नवीन गुप्ता बताते हैं कि प्रथम मुक्ति संघर्ष 1857 के समय से ही बरेली कॉलेज क्रांतिकारियों का गढ़ रहा। 1857-58 के मध्य कॉलेज परिसर में नाना साहब पेशवा, बेगम हजरत महल, हकीम अजीमुल्ला खां, मौलवी अहमदुल्ला शाह फैजाबादी, शहजादा फिरोज व बंदिश नवाब ने मिलकर कैंप बनाया था। रुहेलखंड में 1857 के क्रांति के नेता नवाब खान बहादुर खान थे, जिन्हें ये सभी सहयोग देते रहे। क्रांति असफल होने पर बरेली पर अंग्रेजी का अधिकार हो गया। इसके बाद क्रांतिकारी गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए बरेली कॉलेज में 42 हाईलैंडर रेजिमेंट का मुख्यालय बना दिया गया था। ऐसे में 1858 के अंत में कॉलेज में दोबारा पढ़ाई शुरू हो सकी।
अंग्रेजों ने बंद कराई थी पढ़ाई
स्वतंत्रता की गतिविधियों में युवाओं के प्रथम पंक्ति में रहने से वर्ष 1877-1883 तक बरेली कॉलेज में शिक्षण कार्य बंद रहा। कुमाऊं व रुहेलखंड के वरिष्ठ नागरिकों के सहयोग से पंडित रामनारायण ने अथक प्रयास किए। 17 फरवरी 1893 को बरेली कॉलेज को सुचारु रूप से चलाने के लिए केंद्रीय समिति बना दी गई। इसमें टीजे स्टॉक मलिक, मोहम्मद वली खां, पीएन बनर्जी, नवाब अब्दुल अजीज खां, अजीमुद्दीन, सरदार मोहम्मद, ए खान, बाबू सदानंद, पंडित छेदालाल, रामबहादुर, लाला दामोदर दास, पंडित रामनारायण इसमें सदस्य के रूप में शामिल थे।
युवाओं की सक्रियता देख प्राचार्य ने दिया इस्तीफा
वर्ष 1908 में एल्डर्सन को कॉलेज का प्राचार्य बनाया गया था। उनके कार्यकाल में ही वर्ष 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हो गया था। जलियांवाला बाग व रोलेट एक्ट के मुद्दे पर प्राचार्य एल्डर्सन ब्रिटिश सरकार के विरोध में आ गए थे। कॉलेज की रग-रग में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ प्रतिरोध का स्वर गूंज रहा था। ऐसे में छात्रों की सक्रियता देखते हुए एल्डर्सन बाद में अंग्रेज सरकार के पक्ष में आए और पद से इस्तीफा दे दिया था।
महात्मा गांधी के आह्वान पर आगे आए युवा
असहयोग आंदोलन के प्रचार-प्रसार के लिए शौकत अली, मोहम्मद अली और महात्म गांधी वर्ष 1920 में बरेली आए थे। यहां बरेली कॉलेज के छात्र उनके भाषण से खासे प्रभावित हुए। उनके आह्वान पर छात्रों ने शराब की दुकानों के सामने पिकेटिंग की। विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। धीरे-धीरे असहयोग आंदोलन रुहेलखंड मंडल में फैल गया। वर्ष 1925-1927 तक एसी दत्ता कॉलेज के प्राचार्य बने। बाद में एचपी हैंपस्टेड को यह जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने भी छात्रों की गतिविधियों देखते हुए इस्तीफा दे दिया था।