बदायूं। आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। जिले में बड़ी संख्या में ऐसे बुजुर्ग हैं जिन्होंने आजादी की सुबह भी देखी है। उनके सामने भारत स्वतंत्र हुआ। कई ऐसे लोग भी हैं जिनके पिता ने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया। जेल गए, अंग्रेजी सरकार की यातनाओं को सहा और जुर्माना भी भरा।
स्वतंत्रता संग्राम और स्वतंत्र भारत की पहली सुबह यह लोग बाल्यावस्था में थे। कई बुजुर्गों का कहना है कि 15 अगस्त 1947 की सुबह लोग कह रहे थे कि गदर हो गया है। रेडियो पर भारत विभाजन और दंगों की सूचनाएं थीं। जिले में कुल 309 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सूचीबद्ध हैं। इनमें शहर तहसील के 135, सहसवान/बिल्सी तहसील के 72, बिसौली तहसील के 52 और दातागंज तहसील के 50 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हैं।
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छोड़ दिए जाओगे, कह दो कि आंदोलन से मतलब नहीं
दातागंज के गांव गंडहा के स्वतंत्रता सेनानी पंडित निरंजन लाल को अंग्रेजी हुकूमत ने 1941 में छह माह कैद के साथ 800 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। निरंजन लाल के बेटे सूर्यप्रकाश अग्निहोत्री की आयु अब 87 वर्ष से ज्यादा है। सूर्य प्रकाश अग्निहोत्री बताते हैं कि उनके पिता को आठ सौ रुपये और छह माह की कैद की सजा मिली थी। उनके पिता को उनके सामने ही गिरफ्तार किया गया। अंग्रेज अफसरों ने पिता से कहा कि कह दो आंदोलन में तुम शामिल नहीं हो तो छूट जाओगे, लेकिन पिता ने आजादी की मांग की। उनको जेल भेज दिया गया। 1947 में भारत विभाजन के साथ आजादी मिली तो खुशी हुई, लेकिन पिता के दिल में विभाजन की टीस थी। पिता ने जब बताया कि अब भारत आजाद हो गया है तो वह भी काफी खुश हुए कि पिता को जेल भेजने वाली सरकार चली गई है।
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अचानक शुरू हो गई थी घर-घर तलाशी, गदर की ज्यादा थी चर्चा
प्राथमिक शिक्षक संघ के पूर्व जिलाध्यक्ष शाकिर अली के पिता सैय्यद असगर अली रिजवी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लोगों को लामबंद करने के लिए मुहिम छेड़ रखी थी। करीब 82 वर्ष के हो चुके शाकिर अली बताते हैं कि जब देश स्वतंत्र हुआ उस वक्त उनकी उम्र करीब सात-आठ वर्ष थी। आजादी के आंदोलन की यादें उनके जेहन में हैं। 1945 में उनके पिता को अंग्रेजी हुकूमत ने जेल में डाल दिया। जेल से आने के बाद पिता ने फिर से स्वतंत्रता आंदोलन को धार देनी शुरू कर दी। बाल्यावस्था में वह भी टोलियों के साथ इंकलाब जिंदाबाद और वंदे मातरम के नारे लगाते हुए घर से निकलते थे। 15 अगस्त को भारत विभाजन के साथ आजादी मिली तो गदर भी हो गया। कत्लेआम भी हुआ। सैदपुर में अचानक पुलिस ने बड़े अभियान चलाकर तलाशी शुरू कर दी। यहां के कई परिवार भी पाकिस्तान चले गए।
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पिता के साथ बाजार में था तब आजादी के साथ गदर की सूचना मिली
मोहल्ला शहवाजपुर निवासी महेश चंद्र शर्मा ने भी आजादी की सुबह देखी है। करीब 83 वर्ष के हो चुके महेश चंद्र शर्मा मूल रूप से इस्लामनगर के निवासी हैं। जब देश स्वतंत्र हुआ उस समय महेश चंद्र शर्मा की उम्र करीब आठ-नौ साल थी। वह इस्लामनगर में ही रहते थे। स्कूल जाना शुरू हो गया था। स्वतंत्रता आंदोलन और आजादी की सुबह की यादें उनके जेहन में हैं। शर्मा का कहना है कि 15 अगस्त 1947 को वह अपने पिता के साथ बाजार में थे। गहमागहमी तो कई दिन से चल रही थी लेकिन 15 अगस्त को पता लगा कि देश स्वतंत्र हो गया है, लेकिन गदर होने लगा है। बंटवारा हुआ है। पाकिस्तान के रूप में एक नया देश बना है और पाकिस्तान में हिंदुओं की हत्या की जा रही हैं। पाकिस्तान से भारत आने वाली रेलगाड़ियों में लाशें निकल रही हैं। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे लोग हाथों में तिरंगा लेकर निकल रहे थे।
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आजादी की खुशी के साथ विभाजन का दर्द भी हुआ
वयोवृद्ध डॉ. ब्रजपाल वार्ष्णेय की उम्र करीब 99 साल हो चुकी है। वजीरगंज ब्लॉक के पहले ब्लॉक प्रमुख रहे डॉ. ब्रजपाल वार्ष्णेय देश आजाद होने के वक्त युवा अवस्था में थे। स्वतंत्रता आंदोलन, अंग्रेजी हुकूमत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर जुल्म और द्वितीय विश्वयुद्ध के बारे में उनके जेहन में यादें अब भी ताजा हैं। वह बताते हैं कि अगस्त 1947 में वह दिल्ली में डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहे थे। अंग्रेजों के जुल्म लगातार बढ़ते जा रहे थे। 15 अगस्त को जब पता लगा कि अंग्रेजी हुकूमत का अंत हो गया है तो खुशी भी हुई लेकिन भारत विभाजन और कत्लेआम को लेकर दुख भी हुआ। उस समय मीडिया माध्यम न के बराबर थे। लोगों को रेडियो या फिर चुनिंदा अखबारों से ही सूचनाएं मिलती थीं। बदायूं से लेकर दिल्ली तक उन्होंने आंदोलन को देखा। स्वतंत्रता सेनानी आजादी के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार थे।