- तीन करोड़ रुपये खर्च कर दिसंबर 2022 में मीरगंज क्षेत्र में लगाए गए थे 30 प्लांट, ज्यादातर साबित हो रहे शोपीस
- टेंडर की शर्तों में था रखरखाव का प्रावधान, अब न तो ठेकेदार ध्यान दे रहा, न ही अधिकारी
बरेली। मीरगंज क्षेत्र के गांवों में तीन करोड़ रुपये से ज्यादा की लागत से दिसंबर 2022 लगाए गए तीस आर्सेनिक रिमूवल प्लांट में से 20 ठप पड़े हैं। ग्रामीणों की मानें तो लगने के तीन-चार माह बाद ही ये प्लांट ठप हो गए थे। टेंडर की शर्तों में रखरखाव का प्रावधान होने के बावजूद न तो संबंधित फर्म ध्यान दे रही है, न ही अफसर संज्ञान ले रहे हैं। 30 में से कई प्लांट तो अभी तक ग्राम पंचायत और जल निगम को हस्तांतरित भी नहीं हुए हैं। यह हाल तब है, जबकि इन गांवों में कैंसर लोगों की जिंदगियां निगल रहा है।
क्षेत्र के 20 गांवों में कैंसर से लोगों की मौत का सिलसिला शुरू हुआ तो पानी की जांच कराई गई। इसमें आर्सेनिक की मात्रा अधिक पाए जाने पर क्षेत्रीय लोगों ने स्वच्छ पानी मुहैया कराने के लिए आवाज उठाई। मुद्दा विधानसभा में गूंंजा तो सरकार की ओर से आर्सेनिक रिमूवल प्लांट लगवाने का निर्णय लिया गया। टेंडर निकाले गए और कोलकाता की निजी फर्म ने दिसंबर 2022 में प्रभावित गांवों में प्लांट लगवाए, पर इनके संचालन व रखरखाव का कोई इंतजाम नहीं किया गया, जबकि अनुबंध में इसका प्रावधान था।
अनुबंध का पालन न होने पर जल निगम की स्थानीय अभियंता ने विभागीय मुख्यालय को अवगत कराया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। जल निगम के मुताबिक अभी तक तीस में से सात प्लांट ही पूरी तरह से हस्तगत किए गए हैं। दस प्लांट संचालित होने का दावा जल निगम ने किया है। अगर इस दावे को सही माना जाए तो भी बीस प्लांट ठप हैं। इस वजह से तमाम परिवारों के लोग दूषित पानी पीने के लिए मजबूर हो रहे हैं। सक्षम परिवारों ने तो अपनी व्यवस्था कर ली, पर आर्थिक रूप से कमजोर लोग पानी के नाम पर जहर पीने को विवश हैं। अमर उजाला ब्यूरो
प्लांट का अनुरक्षण नहीं किया जाना अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन है। जल निगम मुख्यालय को मामले से अवगत कराया है। कई प्लांट तो हैंडओवर भी नहीं हुए हैं। इस मामले में फर्म के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। - जगप्रवेश, मुख्य विकास अधिकारी