बरेली। मौसम के अनुकूल और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सहने की क्षमता रखने वाली गिनी फाउल (पोल्ट्री प्रजाति मुर्गी) की होल जीनोम सीक्वेंसिंग (संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण) में केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान (सीएआरआई) को बड़ी सफलता मिली है। गिनी फाउल की खूबियों वाले जीन पहचानकर उन्हें विकसित किया गया है। साथ ही, इसकी खूबियों से कैरी कादंबरी प्रजाति भी विकसित की है।
सीएआरआई की प्रोजेक्ट हेड वैज्ञानिक डॉ. सिम्मी तोमर ने बताया कि गिनी फाउल विषम परिस्थितियों को भी सहन कर लेती है। इसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता अन्य प्रजाति की मुर्गियों की तुलना में अधिक होती है। यह प्रजाति किसानों और पोल्ट्री व्यवसाइयों के लिए लाभकारी है। गिनी फाउल मूल रूप से साउथ अफ्रीका के गिनीया की प्रजाति है, मगर जीनोम सीक्वेंसिंग न होने से अनुवांशिक गुण अस्पष्ट थे। लिहाजा, डॉ. सिम्मी के निर्देशन में शोधार्थी अलग राजा ने काम शुरू किया। डाटा विश्लेषण में डॉ. रवि ने सहयोग किया।
खूबियों को पहचानने के लिए साल 2013 में ही कार्य शुरू हो गया था। गिनी फाउल की खूबियों वाले जीन को तकनीक के जरिये विकसित किया गया। नतीजा रहा कि महज गर्मियों में अंडे देने वाली गिनी फाउल अब सर्दियों में भी अंडे देने के अनुकूल हो गई है। वहीं, मांस को बढ़ाने के लिए किए गए आनुवांशिक सुधार भी सफल रहे। यह मुक्तेश्वर, दक्षिण भारत की जलवायु के अनुकूल हो गई है।
कम देखभाल की जरूरत
डॉ. सिम्मी के मुताबिक गिनी फाउल चुग कर खाती है, इसलिए इसे कम दाने की जरूरत होती है। आवास, दवा, दाना, पानी आदि की जरूरत कम होने से इनके पालन पर लागत कम आती है। जीनोम सीक्वेंसिंग की रिपोर्ट एनसीबीआई (नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफाॅर्मेशन) प्लेटफॉर्म पर अपलोड कर दी गई है, ताकि इसकी मूल प्रजाति का पता चले।
कैरी कादंबरी की भी जीनोम सीक्वेंसिंग पूरी
सीएआरआई में काफी शोध के बाद गिनी फाउल के विकसित जीन से कैरी कादंबरी प्रजाति विकसित की गई। इसके संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण का कार्य पूरा हो गया है। जीनोम साइज, जेनेटिक मार्कर आदि दर्ज कर लिए गए हैं। पब्लिक डोमेन एनसीबीआई पर जब अपलोड किया तो इसकी खूबियां इरानियन गिनी फाउल के करीब मिली हैं।