अनगिनत लोगों के बेहिसाब समर्पण से बना अमर उजाला
अमर उजाला के निदेशक वरुण माहेश्वरी ने कहा कि 1948 में बोया गया बीज आज विशाल वटवृक्ष बन चुका है। जितनी बड़ी इसकी शाखाएं हैं, उतनी ही मजबूत इसकी बुनियाद है। हमारी इस 75 वर्ष की यात्रा में पुराने जुड़े साथियों को देखता हूं, उनके अनुभव सुनता हूं, तो भावुक भी हो जाता हूं और गर्व से भर जाता हूं। आज इस कार्यक्रम में अमर उजाला से जुड़े लोगों के परिजन भी आए हैं। उन्हें भी धन्यवाद देता हूं क्योंकि उनके समर्पण के बिना यह यात्रा इतनी सुखद नहीं हो सकती थी।
आप सभी ने हमेशा खुद से आगे संस्थान को वरीयता पर रखा। अमर उजाला के मूल्य और उसकी सभ्यता आपसे ही आई है। मुझे खुशी है कि आज की नई पीढ़ी उसे आगे लेकर चल रही है। नए साथियों से कहना चाहूंगा कि जो विरासत और जिम्मेदारी हमें मिली है, इसमें हमारे सभी पूर्वजों के एक-एक पल के योगदान को हमें समझना होगा। अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए जो अपेक्षित है, उसे पूरा करना होगा। धन्यवाद, शुभकामनाएं।
डॉ. अशोक वैश्य ने बताया कि अमर उजाला ने कहा कि आओ काम करें, यह देखकर लगता है कि परिवार का सदस्य किसी काम को करने के लिए कह रहा हो। जब भी जरूरत पड़ी तो संस्थान ने अपने की तरह हर तरफ से मदद की। यही बात सभी को जोड़े रखी है।
कुल्दीप दीपक ने बताया कि 1988 से अमर उजाला से जुड़ा हूं। अब तो अमर उजाला घर जैसा लगता है। 75 वर्ष पूरे हो गए और पता भी नहीं चला। इस आयोजन में कई पूराने साथी कई सालों बाद मिले। उनके साथ अखबार को लेकर ढेरों बातें हुईं और बहुत अच्छा लगा।
सुरेंद्र कुमार खंडेलवाल ने बताया कि अमर उजाला से जब जुड़ा था तो पता नहीं था कि साथ में 32 साल का सफर तय हो जाएगा। पहले काम किया और अब समय के साथ अखबार को बढ़ते हुए देख रहा हूं। मुझे खुशी है कि मैं अमर उजाला का एक हिस्सा हूं और आगे भी रहूंगा।
राकेश मथुरिया ने बताया कि अमर उजाला के साथ एक अलग सा लगाव है। 50 साल हो गए और लगता है जैसे कल ही की बात हो। यहां से जो सम्मान मिला वह अनमोल है। सेवामुक्त होने बाद भी हर आयोजन में अमर उजाला मुझे याद करता है यह बात और कही नहीं हैं।