बीते दो वर्ष में बनाए गए 865 रिसोर्स रिकवरी सेंटर, इनमें से आधे बंद
बरेली। दो साल पहले 65 करोड़ रुपये खर्च कर जिले में 865 रिसोर्स रिकवरी सेंटर (आरआरसी) बनाए गए, पर आधे से ज्यादा केंद्र अब तक संचालित ही नहीं हो सके हैं। शहर की तरह गांवों में भी कूड़े के ढेर लग रहे हैं। यही हाल रहा तो कूड़ा सड़ेगा और बीमारियों की वजह बनेगा। अमर उजाला टीम ने मामले की पड़ताल की तो यह हकीकत सामने आई।
ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन के लिए स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के अंतर्गत वर्ष 2022-23 में 23.30 करोड़ और 2023-24 में 41.42 करोड़ रुपये खर्च कर आरआरसी बनाए गए थे। कई गांव में ये सेंटर बंद पड़े हैं। डीपीआरओ कमल किशोर ने बताया कि कानपुर मॉडल लागू कर इनका संचालन कराएंगे। इन केंद्रों के संचालन के लिए ग्रामीणों की भागीदारी जरूरी है। प्रधानों और पंचायत सचिवों के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जाएगा। गांवों में भी घर-घर कूड़ा उठान की योजना लागू करेंगे। 30 रुपये महीने का शुल्क लेकर कूड़ा निस्तारण का सिस्टम संचालित कराएंगे।
इसलिए बनाए गए रिसोर्स रिकवरी सेंटर
घर-घर से कचरा एकत्र करके उसे आरआरसी में अलग-अलग किया जाना है। गीले कचरे से खाद और सूखे कचरे से प्लास्टिक, लोहा व कबाड़ में बिक्री योग्य अन्य सामान को सेंटर पर ही अलग किया जाना है। जो प्लास्टिक निकलेगा, उसे प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट को भेजा जाना है।
मनौना का सेंटर तैयार, पर नहीं हो रहा संचालन
रामनगर ब्लाॅक के मनौना गांव में आरआरसी बनकर तैयार हो गया है, लेकिन उसका संचालन नहीं हो रहा है। ग्राम विकास अधिकारी करन सिंह के अनुसार ठोस एवं तरल कूड़े के प्रबंधन के लिए 14 लाख रुपये की लागत से सेंटर तैयार हुआ है। प्रधान की ओर से उनके पति मुन्त्याज ने बताया कि मशीनें आने के बाद सेंटर का संचालन शुरू करेंगे।
गिरधरपुर में भी नहीं हो रहा कूड़े का निस्तारण
शीशगढ़ विकास खंड के ग्राम गिरधरपुर में चार लाख रुपये की लागत से बने आरआरसी पर ताला लगा है। अभी तक केंद्र पर एक बार भी कूड़ा नहीं आया है। ग्राम प्रधान ने बताया कि जल निगम ने पाइप लाइन बिछाने के लिए सड़क खोद दी है। इस वजह से कूड़ा केंद्र तक नहीं पहुंच पा रहा है। अमर उजाला ब्यूरो
आरआरसी का संचालन तब ठीक से हो पाएगा, जब लोग इसके प्रति जागरूकता दिखाएं। सेंटरों के संचालन और प्रबंधन के लिए विभागीय स्तर से प्रयास किए जा रहे हैं। जिले में 300 से अधिक सेंटर संचालित हो रहे हैं। जो रह गए हैं उन्हें सूचीबद्ध करके संचालित कराने की तैयारी है। - कमल किशोर, जिला पंचायत राज अधिकारी