चौधरी तालाब था दूर, इसलिए शुरू किया मंचन
बात सन 1939 की है। सुभाषनगर निवासी रामसेवक शर्मा, बाला प्रसाद शुक्ला, भैरो प्रसाद टंडन व हजारी प्रसाद रामलीला देखने चौधरी तालाब जा रहे थे, लेकिन किसी कारणवश वहां नहीं पहुंच सके। फिर चारों लोगों ने सुभाषनगर में ही रामलीला मंचन करने की ठानी। जगह (सुभाषनगर में आज जहां सेेंट्रल बैंक है) भी मिल गई। तखत, लालटेन, पोशाक आदि का बंदोबस्त किया गया। मंचन शुरू हुआ। धीरे-धीरे दर्शक बढ़ने लगे।
इस पर वर्ष 1940 में पुरानी सब्जी मंडी में मंचन होने लगा। एक साल यहां रामलीला का मंचन हुआ। फिर सन 1941 में इसे रामलीला ग्राउंड में स्थायी रूप से स्थानांतरित कर दिया गया। अब 11 अक्तूबर से यहां 82वें वार्षिकोत्सव का आयोजन चल रहा है। रामलीला देखने के लिए यहां देर रात तक दर्शकों का हुजूम लगा रहता है। यहां होने वाली रामलीला पंडित राधेश्याम कथावाचक की रामायण पर आधारित है।
1968 में हुई शुरुआत
नवादा जोगियान स्थित बाबा वनखंडीनाथ मंदिर में रामलीला की शुरुआत वर्ष 1968 में हुई थी। उस समय ग्राम प्रधान ने रामलीला व दशहरा मेला लगाने का प्रस्ताव पारित कराया था। बाद में वर्ष 1972 में रामलीला कमेटी का गठन हुआ। रज्जू गिरि को सचिव बनाया गया। सचिव ने 30 अक्तूबर 1972 को रामलीला व दशहरा का पंजीकरण कराया। तब से अब तक वही कमेटी के सचिव हैं।
गिरधारी लाल साहू उर्फ पप्पू रामलीला परिषद नवादा जोगियान के संरक्षक हैं। मेला संरक्षक हरिओम राठौर ने बताया कि पड़ोस के जिलों से भी लोग यहां रामलीला देखने आते हैं। परिषद की ओर से प्रतिवर्ष सुबह कृष्णलीला व रासलीला होती है। रात में रामलीला का मंचन 17 दिनों तक दशहरा मेला मैदान में होता है। विजयदशमी के दूसरे दिन शोभायात्रा निकाली जाती है, जिसमें हजारों की संख्या में लोग शामिल होते हैं।