अब यूं डिब्बों में पैक होकरहोता है गुड़ का निर्यात
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कोटवासड़क। रामसनेहीघाट के भिटरिया कस्बे की पहचान अब केवल खेती या गन्ने के उत्पादन से नहीं, बल्कि गुड़ की मिठास से है। यहां सुबह से शाम तक गन्ने का रस उबलता है और उसी से बनता है गुड़। अब गुड़ भी रूप बदल चुका है। तीन प्रमुख जगहों पर पारी व भेली गुड़ के बाद अब सोंठ वाला और ड्राईफूट वाला गुड़ बन रहा है। इसकी पहचान पूरे प्रदेश में बन गई है। रोजाना लगभग 20 क्विंटल गुड़ की बिक्री होती है।
भिटरिया गुड़ उद्योग की नींव वर्ष 1982 में प्रेमसागर यादव ने रखी थी। आज उनके पुत्र अखिलेश कुमार यादव और सुरेश यादव इस पारिवारिक व्यवसाय को आधुनिक रूप दे रहे हैं। अखिलेश की पत्नी अनुराधा यादव भी इस कारोबार में बराबरी की भूमिका निभा रही हैं। अखिलेश बताते हैं, कि देसी गुड़ को आधुनिक रूप दिया है ताकि यह सिर्फ सर्दियों का स्वाद न रहे, बल्कि हर मौसम की मिठास बने। वर्ष 1990 में बृजकिशोर द्विवेदी ने कोल्हू लगाकर गुड़ और राब के निर्माण की शुरुआत की। आज उनके पुत्र चंदन द्विवेदी इस परंपरा को संभाले हुए हैं। वर्ष 2022 में गोंडा के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने उनके हनुमंत देसी गुड़ यूनिट का उद्घाटन किया था।
चंदन बताते हैं कि स्वाद में पारंपरिक मिठास भी बनाए रखने का प्रयास जारी है। लखनऊ, बाराबंकी, सीतापुर, अयोध्या, कानपुर जैसे शहरों में अपनी पहचान बना चुका है। भिटरिया का देसी गुड़ अब केवल गुड़ की डलिया नहीं, बल्कि मिठाई के डिब्बों में पैक होकर घरों तक पहुंचता है। स्थानीय दुकानों पर सादा गुड़, सोंठ गुड़, तिल गुड़, अजवाइन गुड़, मूंगफली गुड़ लड्डू, मेवा गुड़ और बर्फी जैसे उत्पाद सजे रहते हैं। इनकी कीमत 60 प्रति किलो से शुरू होकर, 600 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है। स्थानीय दुकानदार रामवृक्ष बताते हैं, अब तो लोग इसे मिठाई के रूप में खरीदते हैं। शादी-ब्याह और त्योहारों में भिटरिया का गुड़ का डिब्बा गिफ्ट देना फैशन बन गया है।