बाराबंकी। पारिवारिक न्यायालय ने बिना उचित कारण के मायके में रह कर पतियों को परेशान करने वाली महिलाओं को नसीहत देने वाला एक आदेश पारित किया है। अपर प्रधान न्यायाधीश द्वितीय कृष्ण कुमार की कोर्ट ने पांच साल तक चले एक महिला के 50 हजार रुपये प्रतिमाह के गुजारे भत्ते के दावे को इस लिए खारिज कर दिया क्योंकि महिला किसी भी शर्त पर पति के साथ रहने को राजी नहीं थी।
कोर्ट ने सिर्फ महिला के पुत्र को बालिग होने तक प्रतिमाह तीन हजार रुपये गुजारा भत्ता अदा करने का आदेश पति को दिया। दरियाबाद कोतवाली के एक गांव में अपने मायके में रहने वाली महिला का विवाह सतरिख थाना क्षेत्र में गोमती नदी के किनारे एक गांव के रहने वाले प्रदीप कुमार के साथ एक मई 2019 को हुआ था। महिला ने 28 सितंबर 2020 को न्यायालय पर दावा कर अपने व अपने तत्कालीन पांच माह के पुत्र के भरण-पोषण के लिए पति से 50 हजार रुपये प्रतिमाह दिलाए जाने की मांग की। पति ने अदालत पर पत्नी के आरोपों को निराधार बताने के साथ ही साक्ष्य भी प्रस्तुत किए।
उसने पत्नी को हर शर्त पर घर ले जाने की बात कही। लेकिन पत्नी ने अदालत में कहा कि पति चाहे उसकी सभी शर्तें मान ले लेकिन वह ससुराल नहीं जाएगी। वह मायके में रहकर ही पति से गुजारा भत्ता चाहती है। पति ने अदालत को बताया कि वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान है। अनाज व फल एवं सब्जी की खेती करके परिवार का भरण-पोषण करता है। पत्नी चाहती है कि माता-पिता को छोड़कर उसके साथ अलग रहूं। पत्नी विवाह के छह-सात माह बाद से ही मायके में रहने लगी।
पत्नी कोर्ट में दहेज उत्पीड़न व पति की 60-65 हजार रुपये प्रतिमाह की आमदनी के संबंध में कोई भी ठोस साक्ष्य नहीं दे सकी। जबकि पति ने महिला के निजी चिकित्सालय में नर्स होने के साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए बताया कि वह स्वयं हर माह 15 हजार रुपये कमाती है। इस पर कोर्ट ने महिला का हर्जाना देने का दावा खारिज कर दिया। (संवाद)