संचार क्रांति ने विकास को नया आयाम दिया है। हजारों मील दूर बैठे अपनोें से चंद पलों में फोन, ह्वाट्स अप, इंटरनेट या मोबाइल फोन के जरिए दो मिनट में बात कर उनका कुशलक्षेम पूछा जा सकता है। लेकिन इस संचार क्रांति की दौड़ और धन कमाने की लालच में इनके कुप्रभावों को जिम्मेदार भूल गए हैं।
अधिकारी, ठेकेदार व उद्योगपति मानकों को दरकिनार कर आबादी क्षेत्र में ही मोबाइल टॉवर स्थापित किए हैं, जिससे लोगों की दैनिक दिनचर्या प्रभावित हो रही है। जनपद में करीब 250 टॉवर शहर से लेकर गांव तक लगे हैं। इनमें से 142 मोबाइल टॉवर भारत संचार निगम लिमिटेड के हैं।
लेकिन इनमें से अधिकांश टॉवर मानकविहीन लगे हैं। कहीं किसी के छत पर टॉवर लगा है तो किसी के घर के बगल में। इन टॉवरों से दिनभर हैं हजारों कॉलें होती हैं, जिनसे निकलने वाली घातक तरंगों का प्रभाव आम आदमी के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। लेकिन जिम्मेदार एक-दूसरे के पाले में गेंद डाल पल्ला झाड़ रहे हैं।
एक जगह पर तीन-तीन टॉवर
अभय नगर मोहल्ला में एक ही जगह पर तीन-तीन कंपनियों के मोबाइल टॉवर लगे हैं। घर से महज 20 फीट की दूरी पर ही यह तीनों टॉवर लगे हैं, जिसका कुप्रभाव यहां के लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। बेगमगंज कस्बा में भी आबादी के बीच मोबाइल टॉवर स्थित है।
इनसे निकलने वाली तरंगें लोगों के स्वास्थ्य को तो प्रभावित करती ही हैं। इन टॉवरों के गिरने की आशंका से भी लोग भयभीत रहते हैं। शहर के बीचों बीच स्थित लैया मंडी में भी मोबाइल टॉवर स्थित हैं। यहां की आबादी को बेहद सघन हैं। जिसके कारण यहां के लोग टॉवरों से निकली घातक तरंगों से सबसे अधिक प्रभावित हैं।
पांच किमी तक रेडिएशन
मोबाइल टॉवर हर पांच किमी के रेडियम में लगाए जाते हैं। संघन आबादी के बीच में यहां यह मानक नहीं माना जाता है। जनसंख्या घनत्व अधिक स्थान वालें क्षेत्रों में घनत्व के हिसाब से टॉवर लगाए जाते हैं।
आमजन भी परेशान
मोबाइल टॉवरों से निकलने वाली तरंगों से आमजन भी परेशान हैं। बेगमगंज निवासी मो. इस्माइल कहते हैं कि आबादी क्षेत्र में टावर लगने के बाद भी लोगों की दिनचर्या काफी प्रभावित हैं। अब पहले की अपेक्षा रात को नींद भी कम आती है।
ममासिद रिजवी कहते हैं कि जब टीवी के पास रखे मोबाइल पर कॉल आती हैं तो टीवी में झिलमिलाहट आने लगती है। कानूनगोयान मोहल्ला निवासी कुरैशा खान कहते हैं कि ये तरंगे दिल व दिमाग पर असर करती हैं।